जानिये कैसे उत्‍पन्‍न हुए नन्‍दीश्‍वर, भोलेनाथ को क्‍यों हैं इतने प्रिय ??

क्‍यों भोलेनाथ को इतने प्रिय हैं नन्‍दीश्‍वर ???

आप पूरी दुनियां में स्‍थित किसी भी शिव मंदिर में जाएं आपको सबसे पहले जिनके दर्शन होते हैं वो हैं भगवान नंदीश्‍वर। भगवान नंदीश्‍वर ना सिर्फ देवाधिदेव शिव की सवारी हैं बल्‍कि यह सभी गणपतियों के प्रमुख सेनापति भी हैं। भगवान शिव और माता पार्वती इन्‍हें पुत्र के समान प्रेम करते हैं।

शिव के नंदि
शिव के नंदि

कह सकते हैं कि श्रीराम और हनुमान जैसा ही प्रेम भगवान शिव और भगवान नंदीश्‍वर के बीच भी है। आइए जानते हैं कि आखिर कौन थे नंदीश्‍वर और क्‍यों भगवान शिव ने इन्‍हें अपना पुत्र माना है।सबसे पहले तो ये जान लीजिए कि ऋषि शिलाद के पुत्र ऋषि शैलादि ही भगवान नन्‍दीश्‍वर हैं। 18 पुराणों में से एक लिंग पुराण में ऋषि शैलादि अपने भगवान नंदीश्‍वर के रूप में जन्‍म और शिव के सबसे प्रिय गणों में शामिल होने की कथा विस्‍तार से कहते हैं।

अनोखे वरदान के लिए ऋषि शिलाद की तपस्‍या

ऋषि शिलाद को एक ऐसे पुत्र की अभिलाषा थी जो ना सिर्फ अयोनिज हो बल्‍कि मृत्‍युहीन भी हो। इस पर देवराज इंद्र ने उन्‍हें भगवान शिव को प्रसन्‍न करने की बात कही। इंद्र के अनुसार, ”अयोनिज और मृत्‍यु हीन पुत्र दुर्लभ हैं। ब्रह्मा जी भी अयोनिज नहीं है तथा मृत्‍यु से रहित नहीं है। लेकिन, रुद्र अगर प्रसन्‍न हो जाएं तो वे मृत्‍युहीन और अयोनिज पुत्र प्रदान कर सकते हैं। उनके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है।”

इसके बाद ऋषि शिलाद ने कठिन तपस्‍या शुरू की। हजारों साल तक उनका तप जारी रहा। उनके शरीर में बमई बन गई, कीड़े और दीमकों ने उनके शरीर पर घर बना लिया। देह में मात्र हड्डियां ही बची थीं। तब कहीं जाकर भगवान शिव प्रसन्‍न और प्रगट हुए। ऋषि शिलाद ने वरदान के रूप में भगवान शिव से अयोनिज और मृत्‍युहीन पुत्र प्रदान करने की बात कही।

मुस्‍कुराए शिव और दे दिया अनोखा वरदान

ऋषि शिलाद के इस अनोखे वरदान को सुनकर शिव थोड़ा मुस्‍कुराए और उन्‍हें ये वर दिया कि वह जगत में उन्‍हीं के पुत्र बनकर जन्‍म लेंगे। ये पुत्र अयोनिज और मृत्‍युहीन होगा। शिव ने ऋषि शिलाद को बताया कि उन्‍हें स्‍वयं ब्रह्मा ने किसी बड़े कारण के लिए धरती पर अवतार लेने के लिए कहा है और वो अवतार आपके पुत्र के रूप में जन्‍म लेगा।

 नंदिश्वर
नंदिश्वर

यज्ञभूमि में उत्‍पन्‍न हुए शिव

वरदान देने के बाद शिव ऋषि शिलाद की यज्ञभूमि में प्रगट हुए, आकाश से पुष्‍प वर्षा की गई। अप्‍सराएं नृत्‍य करने लगीं, देवता स्‍तुतियां करने लगे। ऋषि शिलाद ने भी शिव का स्‍वागत करते हुए कहा, जगत की रक्षा करने वाले तुम मेरे पुत्र रूप में आए हो, हे जगत गुरू अब मेरी रक्षा करो।

पिता ने नाम दिया ‘नंदी’

ऋषि शिलाद ने भगवान शिव के उस रूप की प्रसंशा करते हुए अपने पिता होने का धर्म भी निभाया। हे अयोनिज, हे ईशान तुमने मुझको नन्‍दित अर्थात् आनन्‍दित किया है, इससे आज से आपका नाम नन्‍दी है। ऋषि ने कहा मेरे समान लोक में देव और दानव कोई भी भग्‍यशाली नहीं है जिसके लिए नन्‍दीश्‍वर साक्षात् शिव यज्ञभूमि से उत्‍पन्‍न हुए हैं।

क्‍यों शिव को इतने प्रिय हैं नन्‍दीश्‍वर ???
क्‍यों शिव को इतने प्रिय हैं नन्‍दीश्‍वर ???

दरअसल ‘अल्‍प आयु’ के थे ‘मृत्‍युहीन’ नंदीश्‍वर 

सातवें वर्ष में ही उनके आश्रम में आए मुनि मित्रवरुण ने उन्‍हें अल्‍प आयु वाला बताया। इसके बाद ऋषि शिलाद भारी दु:ख में चले गये। उन्‍होंने तो अपने लिए मृत्‍युहीन पुत्र मांगा था लेकिन उसकी उम्र तो सामान्‍य से भी कम निकली। खुद नंदीश्‍वर भी अपने अल्‍प आयु होने की बात सुनकर निराश हो गए और उन्‍होंने त्रयंबकं का ध्‍यान शुरू कर दिया।

मिला ‘दैविक देह’  

नंदीश्‍वर को निराश देख भगवान चंद्रशेखर शिव मुस्‍कुराकर बोले, ‘हे वत्‍स, नन्‍दी तुमको मृत्‍यु का भय कहां, आपके पिता और मुनि मित्रवरुण ने आपके लौकिक देह को देखा है, दैविक देह को नहीं। इसके बाद शिव ने दिया उन्‍हें दैविक देह।