क्‍या है शिवलिंग ? स्‍वयं ब्रह्मा ने बताया है इसका रहस्‍य!!!

क्‍या है शिवलिंग ? स्‍वयं ब्रह्मा ने बताया है इसका रहस्‍य!!!

हिमालय में, जंगलों में, पर्वत की कंदराओ में, शहर-शहर और गांव-गांव तक के मंदिरों में विराजमान भगवान शिव के लिंगी स्‍वरूप का रहस्‍य आज भी मनुष्‍य प्रजाति के लिए अबूझ पहेली बना हुआ है। शिवलिंग के रहस्‍य को लेकर वेद-पुराण मर्मज्ञ, मुख्‍यधारा के इतिहासकार और प्राचीन खगोल वैज्ञानिक अलग-अलग मत में बंटे हुए हैं हालांकि, शिवलिंग क्‍या है इसकी व्‍याख्‍या पुराणों में काफी पहले ही दी जा चुकी है।

महर्षि वेद-व्‍यास द्वारा रचित अष्‍टादश (18) पुराणों में से पांचवां है ‘लिंग पुराण’। लिंग के प्राकट्य और उसकी महिमा का इस पुराण में विस्‍तार से वर्णन है। लिंग पुराण के पहले भाग में भी ही लिंग के उत्‍पन्‍न होने का वर्णन मिलता है। यहां ऋषिगण और सूतजी के बीच इसके प्राकट्य की चर्चा होती है।  सूतजी के अनुसार लिंग के सर्वप्रथम प्रगट होने की जानकारी ब्रह्माजी ने देवताओं को बताई थी।

लड़ पड़े ब्रह्मा-विष्‍णु

लिंग पुराण के अनुसार एक बार अपनी-अपनी श्रेष्‍ठता को सिद्ध करने के लिए ब्रह्मा और विष्‍णु के मध्‍य घनघोर युद्ध हुआ। इस युद्ध का वर्णन करते हुए स्‍वयं ब्रह्मा ने कहा है, ”युद्ध को देखकर सबके रोंगटे खड़े हो गए। वह युद्ध उसी प्रलय के सागर के मध्‍य मेरे द्वारा रजोगुण की वृद्धि होने पर बैर बढ़ जाने के कारण हुआ।”

प्रकट हुआ दिव्‍य लिंग

जगद्पिता ब्रह्मा ने कहा, ”युद्ध के दौरान ही हम दोनों (ब्रह्मा-विष्‍णु) के बीच अत्‍यंत प्रकाशमान एक लिंग हमारे प्रबोध करने के लिए प्रगट हुआ। वह लिंग अनेकों प्रकार की ज्‍वाला से घिरा हुआ सैकड़ों कालाग्‍नि से भी महान तेजस्‍वी, घटने और बढ़ने से रहित, आदि, मध्‍य, अंत से रहित अव्‍यक्‍त विश्‍व की उत्‍पत्‍ति का कारण था।”ब्रह्मा कहते हैं, ”उस लिंग को देखकर भगवान हरि और मैं भी स्‍वयं मोहित हो गये। उस लिंग को देख भगवान हरि ने मुझसे कहा कि इस अग्‍नि को उत्‍पन्‍न करने वाले तेजस्‍वी लिंग की परीक्षा करनी चाहिये। मैं (विष्‍णु) इसके नीचे की तरफ इसके मूल को देखूंगा तथा आप (ब्रह्मा) ऊपर की ओर शीघ्र प्रयत्‍न पूर्वक जाइये।”

और नहीं मिला लिंग का ओर-छोर

लिंग का निरीक्षण करने के लिए भगवान विष्‍णु ने वाराह का स्‍वरूप धारण किया तो ब्रह्मा ने हंस का। इसके बाद ब्रह्मा (हंस स्‍वरूप) मन और हवा के वेग से लिंग के समानान्‍तर ऊपर की ओर उड़े जबकि विष्‍णु वाराह रूप में नीचे की ओर। अत्‍यंत वेग से 1000 वर्ष तक नीचे जाने पर सूकर रूपधारी नारायण ने लिंग के मूल (अंत) का कुछ भी पता नहीं पाया। ठीक इसी तरह ब्रह्मा भी एक हजार वर्ष तक ऊपर उड़ने के बाद अहंकारवश थककर नीचे गिर गए। वहीं भगवान विष्‍णु भी थककर ऊपर चले आए। दोनों काफी दु:खी थे और उनकी आंखे थक चुकी थीं।

शिवलिंग
शिवलिंग

इसी समय प्रगट हुआ ‘ॐ’

जिस समय दोनों देवता (ब्रह्मा-विष्‍णु) लिंग का परीक्षण ना कर पाने के बाद उदास और थके हुए बैठे थे ठीक उसी समय उस लिंग में से बड़े जोर का शब्‍द हुआ। ब्रह्मा जी के अनुसार, ”उसमें से ॐ ऐसी ध्‍वनि प्‍लुत लक्षण से निकली।”ब्रह्मा जी आगे कहते हैं, ”उस महान घोर नाद को सुनकर ‘यह क्‍या !’ ऐसा हमने कहा। तभी उस लिंग के दाहिने भाग में सनातन भगवान को भी देखा। उस ‘ॐ’ सनातन भगवान के आदि में ‘अकार’, इसके बाद ‘उकार’ तथा उससे परे में ‘मकार’ है, मध्‍य में ‘नाद’ है।”जगद्पिता ब्रह्मा ने को परिभाषित करते हुए कहा, ”आदि वर्ण यानी ‘अ’ को सूर्य के समान मानना चाहिए, ‘उ’ को पावक (अग्‍नि) ‘म’ को चंद्रमण्‍डल की संज्ञा दी जानी चाहिए। वहीं जो मध्‍य में है उसके ऊपर शुद्ध स्‍फटिक वर्ण स्‍वरूप प्रभु विराजमान हैं।”

शिवलिंग का रहस्य
शिवलिंग का रहस्य

लिंग पुराण के अनुसार, ”वह लिंग, वाणी और चिंता से रहित हैं, उसमें से प्रगट हुआ एकाक्षर ब्रह्म (ॐ) को वाणी भी प्राप्‍त न करके लौट आती है। इसे ही अमृत तथा परम कारण सत्‍य आनन्‍द, परब्रह्म परमात्‍मा जानना चाहिए।’