वास्तु पूजन क्यों किया जाना चाहिए ; पढ़ें वैज्ञानिक नजरिया…!!!

धार्मिक कथा ( Mythological Story)

वास्तु का अर्थ है एक ऐसा स्थान जहां भगवान (Bhagwaan) और मनुष्य एक साथ रहते हैं। वास्तुशास्त्र(Vastushastra) एक विज्ञान है जो हमारे घर और काम के स्थान पर समृद्धि, मानसिक शांति, खुशी और सामंजस्य को प्राप्त करने में मदद करता हैं।

वास्तु पूजन
वास्तु पूजन

हमारा शरीर पांच मुख्य पदार्थों से बना है और वास्तु का संबंध इन पांचों ही तत्वों से माना जाता है। ब्रह्मा(Brahma), विष्णु(Vishnu), महेश(Mahesh) अन्य सभी देवी-देवताओं की पूजा के साथ-साथ वास्तु की पूजा भी जाती हैं।

वास्तु पूजन का महत्व

कई मह्त्वपूर्ण कार्यो जैसे अनुष्ठान, भूमि(Bhoomi) पूजन, नींव खनन, कुआं खनन, शिलान्यास, द्वार स्थापन व गृह प्रवेश(Grahpravesh) आदि अवसरों पर वास्तु(Vaastu) देव पूजा का विधान है।

वास्तु पूजन
वास्तु पूजन

कई बार ऐसा होता है कि हमारा घर हमारे शरीर के अनुकूल नहीं होता है तब यह बात हमें प्रभावित करती है और इसी को वास्तुदोष बोला जाता है। पूजन किसी शुभ दिन या रवि पुष्य योग को कराना चाहिए।

वास्तु पूजन सामग्री

पूजन सामग्री में सिक्कें, सुपारी, विभिन्न रंग के सुगंधित द्रव्य, नारियल(Nariyal), पचरंगी नाड़ा, कुमकुम, चावल, खोपरा गोला, आम की लकड़ी, आम के पत्तें, जौ, काले तिल, असली घी, पांच बर्तन पंचमेवा, पांच प्रकार की मिठाई, पांच प्रकार के फल, पांच प्रकार के फूल, पांच प्रकार के पत्ते, चांदी धातु, वस्त्र दान, बंदनवार, मिट्टी के दीपक, तेल, बत्ती, लाल सफेद हरा पीला काले रंग के सूती कपड़ा, थाली, लोटे, दोना, पत्तल, वास्तुपूजन में बनने वाले मंडलों को बनाने के लिए चावल व विभिन्न रंग के दालें जैसे मसूर, चना, मूंग, उड़द आदि की जरुरत पड़ती है।

वास्तु पूजन
वास्तु पूजन

वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान् त्स्वावेशो अनमीवोरू भवान्। यत् त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे।।

अर्थात्-हे वास्तु देवता! हम आपकी सच्चे हृदय से उपासना करते हैं। हमारी प्रार्थना को सुन आप हमें रोग-पीड़ा और दरिद्रता से मुक्त करें। हमारी धन-वैभव की इच्छा भी पूरी करें। वास्तु क्षेत्र या घर में रहने वाले सभी परिजनों, पशुओं व वाहनादि का भी शुभ व मंगल करें।

वास्तुपूजन से एक दिन पहले ही सारे घर(Ghar) की अच्छे से धुलाई करनी चाहिए। रंगोली, बंदनवार व पुष्पों से घर को सजा दिया जाना चाहिए। वास्तुपूजन विधि में वास्तुमंडल का निर्माण करना चाहिए। वास्तुचक्र का निर्माण करना चाहिए।

वैज्ञानिक नज़रिया

यदि भवन सही दिशा में अनुकूल बना है तो जीवनदायिनी ऊर्जा से लबालब रहता है। सूर्य पूरब की तरफ से उदय होते हैं। उदय के तीन घंटे बाद तक सूर्य से जीवनदायिनी ऊर्जा प्रवाहित होती रहती है।

वास्तु पूजन
वास्तु पूजन

प्लाट पूरब पतला हो तो जीवन दायिनी ऊर्जा भवन में बहुत कम प्रवेश करती है। इसके बाद सूर्य(Surya) दक्षिणायन होते हैं तो सूर्य की किरणों में अतिउष्मीय शक्ति बढ़ जाती है और उसके बाद के तीन घंटे तक सूर्य की किरणों में अल्ट्रावायलेट रेज(Ultraviolet Rays) अपने प्रचण्ड वेग में होती है, इस समय सूर्य दक्षिण और पश्चिम में होते हैं, चूंकि दक्षिण और पश्चिम दोनों तरफ प्लाट का विस्तार ज्यादा होने से अल्ट्रावायलेट रेज भवन में भारी मात्रा में प्रवेश करती और भवन की शुभ ऊर्जा अर्थात सुबह के समय में थोड़ी सी प्रवेश की जीवनदायिनी ऊर्जा को पूरी तरह डिस्टर्ब कर देती है। भवन से शुभ ऊर्जा के समाप्त होने पर तरह-तरह की समस्याएं पैदा हो जाती है।