जानिए श्री यंत्र बनाने से पहले अवश्य ध्यान रखनी चाहिए ये जरुरी बाते!!! अन्यथा भोगना पड़ेगा बुरा परिणाम !!!

जानिए श्री यंत्र बनाने से पहले अवश्य ध्यान रखनी चाहिए ये जरुरी बाते!!

यह सर्वाधिक लोकप्रिय प्राचीन यन्त्र है,इसकी अधिष्टात्री देवी स्वयं श्रीविद्या अर्थात त्रिपुर सुन्दरी हैं,और उनके ही रूप में इस यन्त्र की मान्यता है। यह बेहद शक्तिशाली ललितादेवी का पूजा चक्र है,इसको त्रैलोक्य मोहन अर्थात तीनों लोकों का मोहन यन्त्र भी कहते है। यह सर्व रक्षाकर सर्वव्याधिनिवारक सर्वकष्टनाशक होने के कारण यह सर्वसिद्धिप्रद सर्वार्थ साधक सर्वसौभाग्यदायक माना जाता है। इसे गंगाजल और दूध से स्वच्छ करने के बाद पूजा स्थान या व्यापारिक स्थान तथा अन्य शुद्ध स्थान पर रखा जाता है। इसकी पूजा पूरब की तरफ़ मुंह करके की जाती है,श्रीयंत्र का सीधा मतलब है,लक्ष्मी यंत्र जो धनागम के लिये जरूरी है। यंत्र साधना बहुत ही जल्दी शुभ फल प्रदान करती है, लेकिन इसका फल तभी मिलता है जब यंत्र बिल्कुल सटीक उपाय से बना हो। यंत्र शास्त्र के अतंर्गत बताया गया है कि यंत्र निर्माण के किन बातों का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए। ये बातें इस प्रकार हैं-

1.कलम की लंबाई- यंत्र लेखन में काम आने वाली कलम आठ अंगुल लंबी होनी चाहिए।

2.कलम की प्रकृति- शांति कर्म में पीपल से बनी कलम, वशीकरण के लिए चमेली से बनी कलम, सम्मोहन के लिए सोने की, स्तंभन के लिए हल्दी की या तांबे से निर्मित कलम का विधान है।

3.कागज- यदि साधक ब्राह्मण हो तो भोजपत्र पर, क्षत्रिय हो तो ताड़पत्र पर, वैश्य हो तो भूमि पर तथा शुद्र हो को कागज पर यंत्र बनाने का विधान है।

4.गंध या स्याही-वशीकरण के उद्देश्य से निर्मित यंत्र में कुंकुम की स्याही, आकर्षण एवं स्वर्णाकर्षण के लिए कस्तूरी, स्तंभन में हल्दी, देवी-देवताओं की प्रसन्नता के लिए चंदन से निर्मित स्याही का उपयोग करना चाहिए।

5.यंत्र साधना का समय- सुख-शांति और समृद्धि को लक्ष्य बनाकर निर्मित यंत्र ब्रह्ममुहूर्त में तथा देवोपासना एवं इष्ट साक्षात्कार के लिए ब्रह्ममुहूर्त, अभिचार विद्वेषण एवं उच्चाटन के लिए मध्य का समय उपयुक्त रहता है।

6.तिथि, वार एवं नक्षत्र- यंत्र साधना प्रारंभ करने से पहले लक्ष्य के लिए अनुकूल यानी कि शुभ तिथि, वार, नक्षत्र एवं चंद्रमा का सावधानीपूर्वक ध्यान रखना चाहिए।