जानिये जब शिव जी कार्तिकेय को नहीं मना पाए तब उन्होंने क्या किया …….

हैदराबाद  से लगभग  225 कि. मी. की दूरी पर करनूल जिले के आत्मकूर तालुका में घने जंगलो के बीच पर्वत श्रेणियो की श्रखलाओं के बीच श्री शैल पर्वत स्थित है। इसके पास ही कृष्णा नदी बहती है जिसमे पाताल गंगा है जहाँ श्रद्धालु स्नान करते है |

इसके बाद ही श्री मल्लिकार्जुन का देवस्थान आता है जिसके पूर्व दिशा मे त्रिपुरातंक द्वार, पश्चिम मे अलंपुरद्वार, उत्तर मे उमा- महेश्वर  तथा द्क्षिण मे सिद्ध वट है।

पौराणिक कथाओ के अनुसार, शिवजी के छोटे पुत्र श्री गणेश का विवाह पहले हो गया पर उनके बडे पुत्र श्री कार्तिकेय का विवाह गणेश से पहले नही हुआ, जिसपर श्री कार्तिकेय रुष्ट हो गये और इन्ही पर्वत श्रखलाओं में तप करने लगे । उनको मनाने के लिए शिवजी पार्वती जी के साथ यहां पधारे और श्री कार्तिकेय जी को आश्वस्त करने केलिये कि वे उनके साथ हैं, लिंग रूप मे स्थापित हो गए ।

श्रीशैल    शिवम  को मल्लिकार्जुन नाम से भी कहा जाता है तथा द्वादश ज्योति लिंगों मे से एक माना जाता है ।इनकी पूजा-उपासना  विधि पूर्वक की जाती है ।

इस मंदिर का प्रागंण विशाल है परन्तु  गर्भ ग्रह बहुत छोटा है । इस ज्योतिर्लिग  के दर्शन के समय  केवल दूर से ही दर्शन करना होता है जलाभिषेक आदि की अनुमति नही है ।

कहा जाता है कि कुरुक्षेत्र मे स्नान-दान से, नर्मदा नदी के तट पर तप करने से तथा काशी मे अधिक समय रहने से जो पुण्य प्राप्त होता है, उतना महापुण्य श्री शैल मल्लिकार्जुन के दर्शन मात्र से मिल  जाता है । श्री शैल की महानता का वर्णन स्कंद पुराण मे किया गया है तथा किसी भी प्रांत मे जब भी  पूजा या व्रत आरंभ किया जाता है, श्रीशैल का नाम लिया जाता है—-

श्री शैलस्य ईसान्य प्रदेशे…….  या   श्रीशैलस्य उत्तर दिग्भागे……तथा संकल्प कराया जाता है। इस मंदिर की कला तथा वास्तु मे चौल, चालुक्य, पल्लवो तथा विजयनगर के समय  की  कला के दर्शन होते है। शिवाजी महाराज ने, जिन्होने हिंदू साम्राज्य की स्थापना की थी, सन 1674 मे अपने शत्रुओ की परवाह न करते हुए श्री शैल के न केवल दर्शन किए वरन एक स्तंभ का निर्माण भी कराया, जो आजभी है। इस मंदिर के रक्षा के लिये भी उन्होने थोडे मराठे सैनिक छोड रखे थे, जिन्होने रोहिल्लो से  युद्ध करते हुए अपना बलिदान किया ।