आखिर कब से प्रारंभ हुई शिवलिंग की पूजा?

शिव भगवान का निराकार स्वरूप शिवलिंग है। शिवलिंग की पूजा करना कब से प्रारंभ हुआ यह बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है, क्योंकि प्रारंभ में हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा का प्रचलन था या नहीं था यह बात इसे भी सिद्ध होती है की शिव भगवान के इस स्वरूप की पूजा के प्रचलन का क्या रहस्य है यह जानना भी जरूरी है कि आखिर इसी रूप में क्यों पूजा जाने लगा, आइए जानते हैं।

  • पढ़े पहला तथ्‍य :  शिव भगवान ने ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद को सुलझाने के लिए एक दिव्य लिंग (ज्योति) को प्रकट किया था। इस ज्योतिर्लिंग का आदि और अंत ढूंढते हुए ब्रह्मा तथा विष्णु को शिव के परब्रह्म स्वरूप का ज्ञान हुआ। इसी समय से भगवान शिव को परब्रह्म मानते हुए उनके प्रतीक रूप में ज्योतिर्लिंग की पूजा आरंभ हुई। हिन्दू धर्म में मूर्ति की पूजा नहीं होती परंतु शिवलिंग और शालिग्राम को भगवान शंकर और विष्णु का विग्रह रूप मानकर इसी की पूजा की जानी चाहिए।
  • पढ़े दूसरा तथ्‍य : ऐतिहासिक प्रमाणों के मुताबक विक्रम संवत् के कुछ सहस्राब्‍दी पूर्व संपूर्ण धरती पर उल्कापात का अधिक प्रकोप हुआ। आदिमानव को यह रुद्र का आविर्भाव दिखा। जहां-जहां ये पिंड गिरे, वहां-वहां इन पवित्र पिंडों की सुरक्षा के लिए मंदिर बना दिए गए थे। इस तरह धरती पर हजारों शिव मंदिरों का निर्माण हो गया था। उनमें से प्रमुख थे 108 ज्योतिर्लिंग, लेकिन अब केवल 12 ही बचे। शिव पुराण के मुताबिक उस समय आकाश से ज्‍योति पिंड पृथ्‍वी पर गिरे और उनसे थोड़ी देर के लिए प्रकाश फैल गया। इस तरह के अनेक उल्का पिंड आकाश से धरती पर गिरे गए थे।
  • पढ़े तीसरा तथ्य : पुरातात्विक निष्कर्षों के मुताबिक प्राचीन शहर मेसोपोटेमिया और बेबीलोन में भी शिवलिंग की पूजा किए जाने के सबूत मिले हैं। इसके अलावा मोहन-जो-दड़ो तथा हड़प्पा की विकसित संस्कृति में भी शिवलिंग की पूजा किए जाने के पुरातात्विक अवशेष मिले हैं। सभ्यता के आरंभ में लोगों का जीवन पशुओं तथा प्रकृति पर निर्भर था इसलिए वह पशुओं के संरक्षक देवता के रूप में भी पशुपति की पूजा करते थे। सैंधव सभ्यता से प्राप्त एक सील पर तीन मुंह वाले एक पुरुष को दिखाया गया है जिसके आस-पास कई पशु हैं। इसे भगवान शंकर का पशुपति रूप माना जाता है।
  • चौथा तथ्य : प्राचीन भारत ही नहीं संपूर्ण धरती पर मूर्ति पूजा का प्रचलन था इसी के बीच ऐसे लोगों का भी एक समूह था जो कि मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखते थे। उन्होंने ही ईश्वर के निराकार स्वरूप की कल्पना करने शिवलिंग की पूजा का प्रचलन प्रारंभ किया होगा, क्योंकि शिवलिंग को ईश्‍वर का निराकार ज्योतिस्वरूप ही माना गया है। शिवलिंग पूजन के बाद धीरे-धीरे नाग तथा यक्षों की पूजा का प्रचलन हिंदू-जैन धर्म में बढ़ने लगा। बौद्धकाल में बुद्ध और महावीर की मूर्ति‍यों को अपार जन-समर्थन मि‍लने के कारण राम तथा कृष्ण की मूर्तियाँ बनाई जाने लगी।