जानिये दानव गुरु शुक्राचार्य कैसे हो गए शिव पार्वती के संतान समान…

दानव गुरु शुक्राचार्य के संबंध में काशी खंड महाभारत जैसे ग्रंथों में कई कथाएं वर्णित हैं। शुक्राचार्य भृगु महर्षि के पुत्र थे। देवताओं के गुरु बृहस्पति अंगीरस के पुत्र थे। इन दोनों बालकों ने बाल्यकाल में कुछ समय तक अंगीरस के यहां विद्या प्राप्त की। आचार्य अंगीरस ने विद्या सिखाने में शुक्र के प्रति विशेष रुचि नहीं दिखाई। असंतुष्ट होकर शुक्र ने अंगीरस का आश्रम छोड़ दिया और गौतम ऋषि के यहां जाकर विद्यादान करने की प्रार्थना की।

शुक्राचार्य के संबंध में एक और कथा इस प्रकार है।शुक्राचार्य ने किसी प्रकार छल-कपट से एक बार कुबेर की सारी संपत्ति का अपहरण किया। कुबेर को जब इस बात का पता चला तब उन्होंने शिव जी से शुक्राचार्य की करनी की शिकायत की।शुक्राचार्य को जब मालूम हुआ कि उनके विरुद्ध शिव जी तक शिकायत पहुंच गई तो वे डर गए और शिव जी के क्रोध से बचने के लिए झाड़ियों में जा छिपे। आखिर वे इस तरह शिव जी की आंख बचाकर कितने दिन छिप सकते थे। एक बार शिव जी के सामने पड़ गए। शिव स्वभाव से ही रौद्र हैं। शुक्राचार्य को देखते ही शिव जी ने उनको पकड़कर निगल डाला। शिव जी की देह में शुक्राचार्य का दम घुटने लगा। उन्होंने महादेव से प्रार्थना की कि उनको शिव जी की देह से बाहर कर दें।

शिव जी का क्रोध शांत नहीं हुआ। उन्होंने गुस्से में आकर अपने शरीर के सभी द्वार बंद किए। अंत में शुक्राचार्य मूत्रद्वार से बाहर निकल आए। इस कारण शुक्राचार्य पार्वती-परमेश्वर के पुत्र समान हो गए। शुक्राचार्य को बाहर निकले देख शिव जी का क्रोध फिर से भड़क उठा। वे शुक्राचार्य की कुछ हानि करें इस बीच पार्वती ने परमेश्वर से निवेदन किया कि यह तो हमारे पुत्र समान हो गया है। इसलिए इस पर आप क्रोध मत कीजिए। यह तो दया का पात्र है। पार्वती की प्रार्थना पर शुक्राचार्य् को और अधिक तेजस्वी बनाया।