जानिये महाकाल के किस वरदान की वजह से देवता हो गए असहाय…!!!

दानव गुरु शुक्राचार्य के संबंध में काशी खंड महाभारत जैसे ग्रंथों में कई कथाएं वर्णित हैं। शुक्राचार्य भृगु महर्षि के पुत्र थे। देवताओं के गुरु बृहस्पति अंगीरस के पुत्र थे। इन दोनों बालकों ने बाल्यकाल में कुछ समय तक अंगीरस के यहां विद्या प्राप्त की। आचार्य अंगीरस ने विद्या सिखाने में शुक्र के प्रति विशेष रुचि नहीं दिखाई। असंतुष्ट होकर शुक्र ने अंगीरस का आश्रम छोड़ दिया और गौतम ऋषि के यहां जाकर विद्यादान करने की प्रार्थना की।

गौतम मुनि ने शुक्र को समझाया कि बेटे इस समस्त जगत के गुरु केवल ईश्वर ही हैं। गौतम मुनि की सलाह पर शुक्र ने गौतमी तट पर पहुंचकर शिव जी का ध्यान किया। शिव जी ने प्रत्यक्ष होकर शुक्र को मृत संजीवनी विद्या का उपदेश दिया। शुक्र ने मृत संजीवनी विद्या के बल पर समस्त मृत राक्षसों को जीवित करना आरंभ किया।

परिणाम स्वरूप दानव अहंकार के वशीभूत हो देवताओं को यातनाएं देने लगे क्योंकि देवता और दानवों में सहज ही जाति-वैर था।  देवतागण पूरी तरह से असहाय हो गए। वे युद्ध में दानवों को पराजित नहीं कर पाए।। कोई उपाय ने पाकर वे शिव जी की शरण में गए क्योंकि शिव जी ने शुक्राचार्य को मृत संजीवनी विद्या प्रदान की थी।जब शिव जी को ये बात पता चली तो शिव जी क्रोध में आ गए और शुक्राचार्य को पकड़कर निगल डाला। इसके बाद शुक्राचार्य शिव जी की देह से शुक्ल कांति के रूप में बाहर आए और अपने निज रूप को प्राप्त किया।

(सस्ता साहित्य मंडल, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘पौराणिक कथाएं’ से साभार)