यहा शनिदेव के दर्शन करने से शनि की दशा, साढ़ेसाती और ढैय्या में शनि नहीं सताते!!!

यहा शनिदेव के दर्शन करने से शनि की दशा, साढ़ेसाती और ढैय्या में शनि नहीं सताते!!

दिल्ली से 128 किमी की दूरी पर तथा मथुरा से 60 किमी की दूरी पर स्थित कोसी कला स्थान पर सूर्यपुत्र भगवान शनिदेव जी का एक अति प्राचीन मंदिर स्थापित है। इसके आसपास ही नंदगांव, बरसाना एवं श्री बांके बिहारी मंदिर स्थित है। कोकिलावन धाम का यह सुन्दर परिसर लगभग 20 एकड में फैला है। इसमें श्री शनि देव मंदिर, श्री देव बिहारी मंदिर, श्री गोकुलेश्वर महादेव मंदिर , श्री गिरिराज मंदिर, श्री बाबा बनखंडी मंदिर प्रमुख हैं। यहां दो प्राचीन सरोवर और गोऊ शाला भी हैं।

शनि मंदिर में विराजित शनि देव
शनि मंदिर में विराजित शनि देव

कहते हैं जो यहां आकर शनि महाराज के दर्शन करते हैं उन्हें शनि की दशा, साढ़ेसाती और ढैय्या में शनि नहीं सताते। ऐसा क्यो है इसके पीछे एक प्रचलित कथा है तोह आइये जानते है कथा के बारे मे।

शनि महाराज भगवान श्री कृष्ण के भक्त माने जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि कृष्ण के दर्शनों के लिए शनि महाराज ने कठोर तपस्या की। शनि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान श्री कृष्ण ने इसी वन में कोयल के रुप में शनि महाराज को दर्शन दिया। इसलिए यह स्थान आज कोकिला वन के नाम से जाना जाता है।

माता यशोदा ने नहीं करने दिया शनि को कृष्ण दर्शन:

जब श्री कृष्ण ने जन्म लिया तो सभी देवी-देवता उनके दर्शन करने नंदगांव पधारे। कृष्णभक्त शनिदेव भी देवताओं संग श्रीकृष्ण के दर्शन करने नंदगांव पहुंचे। परंतु मां यशोदा ने उन्हें नंदलाल के दर्शन करने से मना कर दिया क्योंकि मां यशोदा को डर था कि शनि देव कि वक्र दृष्टि कहीं कान्हा पर न पड़ जाए।

परंतु शनिदेव को यह अच्छा नहीं लगा और वो निराश होकर नंदगांव के पास जंगल में आकर तपस्या करने लगे। शनिदेव का मानना था कि पूर्णपरमेश्वर श्रीकृष्ण ने ही तो उन्हें न्यायाधीश बनाकर पापियों को दण्डित करने का कार्य सोंपा है। तथा सज्जनों, सत-पुरुषों, भगवत भक्तों का शनिदेव सदैव कल्याण करते है।

कोयल के रूप में श्रीकृष्ण की लीला:

पूर्णपरमेश्वर श्रीकृष्ण शनिदेव कि तपस्या से द्रवित हो गए और शनिदेव के सामने कोयल का रूप लेकर प्रकट हुए और कहा – हे शनि देव आप निःसंदेह अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित हो और आप के ही कारण पापियों, अत्याचारियों और कुकर्मिओं का दमन होता है। आप का ह्रदय तो पिता कि तरह सभी कर्तव्यनिष्ठ प्राणियों के लिए द्रवित रहता है और उन्हीं की रक्षा के लिए आप एक सजग और बलवान पिता कि तरह सदैव उनके अनिष्ट स्वरूप दुष्टों को दंड देते रहते हो। श्रीकृष्ण ने शनिदेव से कहा के यह बृज-क्षेत्र उन्हें परम प्रिय है और इसलिए हे शनिदेव आप इसी स्थान पर सदैव निवास करो क्योंकि कोयल के रूप में आप से मिला हूं इसलिए आज से इस पवित्र स्थान का नाम “कोकिलावन” के नाम से विख्यात होगा।

श्री कृष्ण ने कोयल बन दिए शनिदेव को दर्शन
श्री कृष्ण ने कोयल बन दिए शनिदेव को दर्शन

कोकिलावन स्थित कृष्ण-शनि धाम का महत्म:

बृजमंडल के कोकिलावन में आने वाले हर प्राणी पर शनिदेव विनम्र रहते हैं। कोकिलावन में आने वाले हर भक्त पर शनिदेव के साथ साथ श्रीकृष्ण की कृपा भी बनी रहती है तथा भक्तों पर शनि ढाईया, साडेसाती, महादशा, अंतर्दशा का शुभ प्रभाव पड़ता है। कोकिलावन धाम स्थित शनि मंदिर यहां आकर्षण का केंद्र है। भक्तगण कोकिलावन के मार्ग की परिक्रमा करते हैं। मान्यता के अनुसार श्री कृष्ण ने जब शनिदेव को दर्शन दिया था तब आशीर्वाद भी दिया कि यह कोकिलावन उनका है और जो कोकिलावन की परिक्रमा कर शनि पूजन करेगा, वह कृष्ण संग शनि की कृपा भी प्राप्त करेगा।

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