सर्वपितृ अमावस्या 2020 : 16 दिन श्राद्ध नहीं किया है तो इस दिन करें ये काम !!!

आश्विन मास की कृष्ण अमावस्या को सर्वपितृ मोक्ष श्राद्ध अमावस्या कहते हैं। यह दिन श्राद्ध का आखिरी दिन होता है। अगर आप पितृपक्ष में श्राद्ध कर चुके हैं तो भी सर्वपितृ अमावस्या के दिन पितरों का तर्पण करना जरूरी होता है। सभी जाने तथा अनजाने पितरों हेतु इस दिन निश्चित ही श्राद्ध किया जाना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि इस दिन सभी पितर आपके द्वार पर उपस्थित हो जाते हैं। आईये जानते हैं इस दिन किए जाने वाले 10 बड़े काम।
 

श्राद्ध कर्म के प्रकार इस तरफ : नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि, पार्वण, सपिंडन, गोष्ठ, शुद्धि, कर्मांग, दैविक, यात्रा एवं पुष्टि। गरुड़ पुराण के प्रेत कल्प में शव का चिता की अग्नि में दाह संस्कार की विधि, अस्थि संचय की विधि, दशगात्र की विधि, मलिनषोडशी, मध्यमषोडशी श्राद्ध, उत्तमषोडशी श्राद्ध, नारायणबलि श्राद्ध, सपिण्डी श्राद्ध (पिण्ड मेलन) अन्य सम्पूर्ण और्ध्वदैहिक श्राद्ध पिण्डदान, तर्पण के बारे में विस्तार पूर्वक लिखा गया है।
 

1.पिंडदान करे: पितृ पक्ष में पिंडदान का भी महत्व है। सामान्य विधि के मुताबिक पिंडदान में चावल, गाय का दूध, घी, गुड़ और शहद को मिलाकर पिंड बनाए जाते हैं और उन्हें पितरों को अर्पित किया जाता है। यह पिंडदान भी एक प्रकार का होता है।

2. तर्पण करे : पिंडदान के साथ ही जल में काले तिल, जौ, कुशा और सफेद फूल मिलाकर तर्पण किया जाता है। पिंड बनाने के बाद हाथ में कुशा, जौ, काला तिल, अक्षत् व जल लेकर संकल्प करें। इसके पश्चाद इस मंत्र को पढ़े. “ॐ अद्य श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त सर्व सांसारिक सुख-समृद्धि प्राप्ति च वंश-वृद्धि हेतव देवऋषिमनुष्यपितृतर्पणम च अहं करिष्ये।।’

पुराणों में तर्पण को छह भागों में बाटना किया गया है:-

1.देव-तर्पण
2.ऋषि-तर्पण
3.दिव्य-मानव-तर्पण
4.दिव्य-पितृ-तर्पण
5.यम-तर्पण
6.मनुष्य-पितृ-तर्पण।
उक्त सभी नामो से तर्पण किया जाता है।

3.ब्राह्मण भोजन : पिंडदान, तपर्ण एवं गोबलि, श्वानबलि, काकबलि तथा देवादिबलि कर्म करने के बाद ब्राह्मण भोज कराया जाता है। ब्राह्मण नहीं हो तो अपने ही रिश्तों के निर्वसनी तथा शाकाहार लोगों को भोजन कराएं। इस दिन सभी को अच्छे से पेटभर भोजन खिलाकर दक्षिणा भी दी जाती है।

4श्राद्ध समय : श्राद्ध पक्ष में व्यसन तथा मांसाहार पूरी तरह वर्जित माना गया है। पूर्णत: पवित्र रहकर ही श्राद्ध करना चाहिए। श्राद्ध पक्ष में शुभ कार्य भी वर्जित माने गए हैं। रात्रि में श्राद्ध ‍नहीं किया जाता है। श्राद्ध का समय दोपहर साढे़ बारह बजे से एक बजे के बीच उपयुक्त माना जाता है। 

5.इन चार दिव्य पितरों की पूजन : यमराज की गणना भी पितरों में ही होती है। काव्यवाडनल, सोम, अर्यमा तथा यम- ये चार इस जमात के मुख्य गण प्रधान हैं। अर्यमा को पितरों का प्रधान माना गया है तथा यमराज को न्यायाधीश। अग्रिष्वात्त, बहिर्पद आज्यप, सोमेप, रश्मिप, उपदूत, आयन्तुन, श्राद्धभुक और नान्दीमुख ये नौ दिव्य पितर बताए गए हैं। आदित्य, वसु, रुद्र तथा दोनों अश्विनी कुमार भी केवल नांदीमुख पितरों को छोड़कर बाकी सभी को तृप्त करते हैं।
 

6.गीता पाठ करे : सर्वपितृ अमावस्या के दिन पितरों की शांति के लिए और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए गीता के सातवें अध्याय का पाठ करने का विधान भी बताया गया है।

7.पीपल की पूजा करे : सर्वपितृ अमावस्या पर पीपल की सेवा व पूजा करने से पितृ प्रसन्न होते हैं। स्टील के लोटे में, दूध, पानी, काले तिल, शहद तथा जौ मिला लें और पीपल की जड़ में अर्पित कर दें।

8.प्रायश्चित कर्म करे : शास्त्रों में मृत्यु के बाद और्ध्वदैहिक संस्कार, पिण्डदान, तर्पण, श्राद्ध, एकादशाह, सपिण्डीकरण, अशौचादि निर्णय, कर्म विपाक आदि द्वारा पापों के विधान का प्रायश्चित कहा गया है। प्राचीन काल में अपने किसी पाप का प्रायश्‍चित करने के लिए देवता, मनुष्य , भगवान अपने – अपने तरीके से प्रायश्चित करते थे। जैसे त्रेता युग में भगवान राम ने रावण का वध किया, जो सभी वेद शास्त्रों का ज्ञाता होने के साथ-साथ ब्राह्मण भी था। इस कारण उन्हें ब्रह्महत्या का दोष भी लगा था। इसके साथ उन्होंने कपाल मोचन तीर्थ में स्नान और तप किया था जिसके चलते उन्होंने ब्रह्महत्या दोष से मुक्ति पाई थी। प्रायश्‍चित किए बिना जीव मुक्ति नहीं पिछले जन्मों के पाप व पुण्य भी हमारे अंतर्मन में संग्रहित रहते हैं। जिस प्रकार सूर्य कोहरे को हटा देता है तथा बर्फ को पिघला देता है, उसी प्रकार प्रभु श्रीराम और श्रीकृष्ण की भक्ति हमारे अंतर्मन से न केवल अनावश्यक विचारों को नष्ट करती है, अपितु पापों को भी नष्ट करती है। वास्तव में जब हम भक्तिपूर्वक उनका नाम जपते है तब पाप करने की इच्छा ही नष्ट हो जाती है।

9.करें श्राद्ध कर्म ब्रह्मकपा में: अंत में यदि हो सके तो सभी पितरों का गया तथा उसके बाद ब्रह्मकपाली नामक स्थान पर विधिवत रूप से पितरों की मुक्ति और पितृदोष से मुक्ति के हेतु श्राद्ध कर्म करना चाहिए। माना जाता है कि प्रयाग मुक्ति का पहला द्वार है, काशी दूसरा, गया तीसरा और अंतिम ब्रह्मकपाली है। यहां क्रम से जाकर पितरों के प्रति श्राद्ध से मुक्ति मिल जाती है।

बलि भोजन : बलि के अर्थ बलि देना नहीं बल्कि भोजन कराना भी होता है। इस श्राद्ध में गोबलि, श्वानबलि, काकबलि और देवादिबलि कर्म करें अर्थात इन सभी के लिए विशेष मंत्र बोलते हुए भोजन सामग्री निकालकर उन्हें ग्रहण कराई जाती है। अंत में चींटियों के लिए भोजन सामग्री पत्ते पर निकाले। कौओं, कुत्तों, गायों और चींटिों के लिए भी अन्न का अंश निकालते हैं क्योंकि ये सभी जीव यम के काफी नजदीकी हैं।