इस मंदिर में है विश्व का सबसे बड़ा गलियारा, कुंड में नहाने से दूर हो जाते हैं सभी रोग :

हिंदुओं के पवित्र तीर्थस्थलों में से रामेश्वरम मंदिर बहुत ही विशाल व प्रसिद्ध मंदिर है। ये पवित्र तीर्थस्थल तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में स्थित है। मंदिर में स्थापित शिवलिंग 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक शिवलिंग माना जाता है। शिव भगवान को समर्पित रामेश्वरम् ज्योतिर्लिंग देशभर में प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। मान्यताओं के मुताबिक यहां मौजूद शिवलिंग शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए बहुत शुभ माना जाता है। रामेश्वरम में हर वर्ष लाखों श्रृद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते है। सावन के महीने में इस मंदिर की विशेषताएं ओर भी अधिक बढ़ जाती है। श्री रामनाथस्वामी को मुख्य रूप से शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है।

145 खम्भों पर टिका है यह मंदिर:

रामेश्वरम मंदिर जाने के लिए कंक्रीट के 145 खम्भों पर टिका हुआ करीब सौ साल पुराना पुल है। इस पुल से होकर गुज़रते हैं रामेश्वर जाने वाले लोग । समुद्र के बीच से निकलती ट्रेन का दृश्य बहुत ही रोमांचक लगता है। इस पुल के अलावा सड़क मार्ग से जाने के लिए एक और पुल भी बना है। यहां दर्शन के लिए देश-विदेश से लाखो लोग आते हैं। रामेश्वरम मंदिर का गलियारा विश्व में सबसे बड़ा गलियारा है।

इस मंदिर में देखने को मिलती है अलग-अलग शिल्पी :

यह मंदिर लगभग 15 एकड़ के क्षेत्र में बना हुआ है।इस मंदिर में आपको कई प्रकाल के वास्तुशिल्पी देखने को मिलती है। मंदिर वैष्णववाद व शैववाद का संगम माना जाता है। मंदिर में कला के साथ कई प्रकार की अलग-अलग शिल्पी भी देखने को मिलेती है। इसका सबसे बड़ा कारण इस मंदिर की देखरेख व रक्षा कई राजाओं द्वारा किए जाने का है।

चमत्कारिक गुणों से भरा हुआ है यहां का पानी :

रामनाथ स्वामी मंदिर के बारे में मान्यता है यह कि यहां स्थित अग्नि तीर्थम में जो भी श्रद्धालु स्नान करते है उनके सारे पाप धुल जाते हैं। इस तीर्थ से निकलने वाले पानी को चमत्कारिक गुणों से युक्त माना जाता है। लोगों का यह मानना है कि इस के पानी में डुबकी लगाने वाले लोगों के सभी दुख कष्ट दूर होते हैं और पापों से मुक्ति मिलती है। ऐसा भी कहा जाता है कि इस पानी में नहाने के बाद सभी रोग−कष्ट दूर हो जाते हैं। इसके अलावा इस मंदिर के परिसर में कुल 22 कुंड है जिसमें श्रद्धालु पूजा से पहले स्नान करते हैं।

श्री रण ने रामायण काल में की थी पूजा :

रामायण युग में प्रभु श्रीराम द्वारा शिवजी की पूजा अर्चना कर ही रामानाथस्वामी (शिवजी) के शिवलिंग को स्थापित किया गया था। रामायण के मुताबिक एक साधु ने श्रीराम को कहा था कि शिवलिंग स्थापित करने से वहां रावण के वध के पाप से मुक्ति पा सकते हैं। इसीलिए प्रभु श्रीराम ने भगवान हनुमानजी को कैलाश पर्वत पर एक शिवलिंग लाने के लिए भेजा लेकिन वह शिवलिंग लेकर समय पर वापस ना लौट सके। इसीलिए माता सीता ने मिट्टी की मदद से एक शिवलिंग तैयार किया जिसे रामलिंग कहा जाता है तथा हनुमान जी वापस लौटे तो उन्हें यह देखकर बहुत दुख हुआ। उनके दुख को देखकर भगवान श्रीराम ने उस शिवलिंग का नाम वैश्वलिंगम रख दिया। इसी कारण से रामनाथस्वामी मंदिर को वैष्णववाद और शैववाद दोनों का संगम कहा जाता है।