आखिर क्यु हुआ भगवन शिव और श्री राम का प्रलयंकारी युद्ध ? जानिए कोन हुआ युद्ध में परास्त..?

बात उन दिनों कि है जब श्रीराम का अश्वमेघ यज्ञ चल रहा था। कई राजाओं के द्वारा यज्ञ का घोड़ा पकड़ा गया लेकिन अयोध्या
की सेना के आगे उन्हें झुकना पड़ा| शत्रुघ्न के आलावा सेना में हनुमान, सुग्रीव और भारत पुत्र पुष्कल सहित कई महारथी उपस्थित थे
जिन्हें जीतना देवताओं के लिए भी संभव नहीं था। कई जगह भ्रमण करने के बाद यज्ञ का घोडा देवपुर पहुंचा जहाँ राजा वीरमणि का
राज्य था। उनके दो पुत्र रुक्मांगद और शुभंगद वीरों में श्रेष्ठ थे। राजा वीरमणि ने भगवान रूद्र की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया था और महादेव ने  उन्हें उनकी और उनके पूरे राज्य की रक्षा का वरदान दिया था। महादेव के द्वारा रक्षित होने के कारण कोई भी उनके राज्य पर
आक्रमण करने का सहस नहीं करता था।

श्री राम और शिवजी में हुआ था युद्ध

जब अश्व उनके राज्य में पहुंचा तो राजा वीरमणि के पुत्र रुक्मांगद ने उसे बंदी बना लिया
और अयोध्या के साधारण सैनिकों से कहा यज्ञ का घोडा उनके पास है इसलिए वे जाकर शत्रुघ्न से कहें की विधिवत युद्ध कर वो
अपना अश्व छुड़ा लें।इधर जब शत्रुघ्न को सूचना मिली की उनके यज्ञ का घोडा बंदी बना लिया गया है तो वो बहुत क्रोधित हुए एवं
अपनी पूरी सेना के साथ युद्ध के लिए युध्क्षेत्र में आ गए। तभी हनुमानजी ने ये सुझाव दिया की कि राजा वीरमणि के राज्य पर
आक्रमण करना स्वयं परमपिता ब्रम्हा के लिए भी कठिन है क्योंकि ये नगरी महाकाल द्वारा रक्षित है। अतः उचित यही होगा कि पहले
हमें बातचीत द्वारा राजा वीरमणि को समझाना चाहिए और अगर हम न समझा पाए तो हमें श्रीराम को सूचित करना चाहिए। परन्तु
शत्रुघ्न ने हनुमानजी की एक न सुनी और हनुमानजी सहित अपनी पूरी सेना के साथ निकल पड़े और सीधे राजा वीरमणि से भीड़ पड़े

शिव और राम का युद्ध

भयानक युद्ध चालू हो गया और अंत में राजा वीरमणि की मूर्छा दूर हुई तो उन्होंने
देखा की उनकी सेना हार के कगार पर है। ये देख कर उन्होंने भगवान रूद्र का स्मरण किया। महादेव ने अपने भक्त को मुसीबत में
जान कर वीरभद्र के नेतृत्व में नंदी, भृंगी सहित सारे गणों को युध्क्षेत्र में भेज दिया। महाकाल के सारे अनुचर उनकी जयजयकार करते
हुए अयोध्या की सेना पर टूट पड़े। शत्रुघ्न, हनुमान और बांकी योधाओं को लगा की जैसे प्रलय आ गया हो। अब इस संकट से बचाव का
एक ही उपाय की हम सब श्रीराम को याद करें। ऐसा सुनते ही सारे सैनिक शत्रुघ्न, पुष्कल एवं हनुमान सहित श्रीराम को याद करने लगे।

अपने भक्तों की पुकार सुन कर श्रीराम तत्काल ही लक्षमण और भरत के साथ वहां
आ गए। जब श्री राम ने देखा की पुष्कल मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ। भरत तो शोक में मूर्छित हो गए। श्रीराम ने
क्रोध में अपनी सारी सेना के साथ शिवगणों पर धावा बोल दिया। जल्द ही उन्हें ये पता चल गया कि शिवगणों पर साधारण अस्त्र बेकार
है इसलिए उन्होंने महर्षि विश्वामित्र द्वारा प्रदान किये दिव्यास्त्रों से वीरभद्र और नंदी सहित सारी सेना को विदीर्ण कर दिया। जब महादेव
ने देखा कि उनकी सेना बड़े कष्ट में है तो वे स्वयं युद्धक्षेत्र में प्रकट हुए। जब महाकाल ने युद्धक्षेत्र में प्रवेश किया तो उनके तेज से श्रीराम
कि सारी सेना मूर्छित हो गयी। जब श्रीराम ने देखा कि स्वयं महादेव रणक्षेत्र में आये हैं तो उन्होंने शस्त्र का त्याग कर भगवान रूद्र को
दंडवत प्रणाम किया एवं उनकी स्तुति की और कहा की हमारा जो भी बल है वो भी आपके आशीर्वाद के फलस्वरूप हीं है। इसलिए हम
पर कृपा करें और इस युद्ध का अंत करें।

ये सुन कर भगवान रूद्र बोले की हे राम, आप स्वयं विष्णु के दुसरे रूप है मेरी आपसे युद्ध करने
की कोई इच्छा नहीं है फिर भी चूँकि मैंने अपने भक्त वीरमणि को उसकी रक्षा का वरदान दिया है इसलिए मैं इस युद्ध से पीछे नहीं हट
सकता अतः संकोच छोड़ कर आप युद्ध करें। श्रीराम ने इसे महाकाल की आज्ञा मन कर युद्ध करना शुरू किया। दोनों में महान युद्ध
छिड़ गया जिसे देखने देवता लोग आकाश में स्थित हो गए। श्रीराम ने अपने सारे दिव्यास्त्रों का प्रयोग महाकाल पर कर दिया पर उन्हें
संतुष्ट नहीं कर सके. अंत में उन्होंने पाशुपतास्त्र के संधान किया और भगवान शिव से बोले की हे प्रभु, आपने ही मुझे ये वरदान दिया है
की आपके द्वारा प्रदत्त इस अस्त्र से त्रिलोक में कोई पराजित हुए बिना नहीं रह सकता, इसलिए हे महादेव आपकी ही आज्ञा और इच्छा
से मैं इसका प्रयोग आप पर हीं करता हूँ।

ये कहते हुए श्रीराम ने वो महान दिव्यास्त्र भगवान शिव पर चला दिया। वो अस्त्र सीधा
महादेव के हृदयस्थल में समां गया और भगवान रूद्र इससे संतुष्ट हो गए। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक श्रीराम से कहा की आपने युद्ध में
मुझे संतुष्ट किया है इसलिए जो इच्छा हो वार मांग लें. इसपर श्रीराम ने कहा की हे भगवान यहाँ इस युद्ध क्षेत्र में भ्राता भरत के पुत्र
पुष्कल के साथ असंख्य योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गए है, उन्हें कृपया जीवनदान दीजिये. महादेव ने मुस्कुराते हुए तथास्तु कहा और
पुष्कल समेत दोनों ओर के सारे योद्धाओं को जीवित कर दिया. इसके बाद उनकी आज्ञा से राजा वीरमणि ने यज्ञ का घोडा श्रीराम को
लौटा दिया और अपना राज्य रुक्मांगद को सौंप कर वे भी शत्रुघ्न के साथ आगे चल दिए।