क्या आप जानते है महिलाओं को भी है श्राद्ध करने का अधिकार..!!जरूर पढ़ें..!!!

श्रा़द्ध करने की परंपरा जीवित रहे
श्रा़द्ध करने की परंपरा जीवित रहे

ऐसा देखा गया है कई बार परिवार के पुरुष सदस्य या पुत्र पौत्र नहीं होने पर कन्या या धर्मपत्नी भी श्राद्ध करती है।इस मामले में गरुड़ पुराण भी महिलाओं को पिण्डदान आदि करने का अधिकार प्रदान करती है। ऐसा इसलिए बताया गया है कि श्रा़द्ध करने की परंपरा जीवित रहे और लोग अपने पितरों को नहीं भूलें।

महाराष्ट्र सहित कई उत्तरी राज्यो में अब पुत्र/पौत्र नहीं होने पर पत्नी, बेटी, बहिन या नातिन ने भी सभी मृतक संस्कार करने आरंभ कर दिए हैं। काशी

आदि के कुछ गुरुकुल आदि की संस्कृत वेद पाठशालाओ में तो कन्याओं को पांण्डित्य कर्म और वेद पठन की ट्रेनिंग भी दी जा रही है जिसमें महिलाओं को श्राद्ध करने कराने का प्रशिक्षण भी शामिल है।

विधवा स्त्री अगर संतानहीन हो तो अपने पति के नाम श्राद्ध का संकल्प रखकर ब्राह्मण या पुरोहित परिवार के पुरूष सदस्य से ही पिंडदान आदि का

विधान पूरा करवा सकती है। इसी प्रकार जिन पितरों के कन्याएं ही वंश परंपरा में हैं तो उन्हें पितरों के नाम व्रत रखकर उसके दामाद या धेवते, नाती आदि ब्राहमण को बुलाकर श्राद्धकर्म की निवृत्ति करा सकते है। साधु सन्तों के शिष्य गण या शिष्य विशेष श्राद्ध कर सकते है।

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