जानिये महाकाल युग के पांच श्राप जिनका प्रभाव आज भी है …..

हिन्दू धर्म ग्रंथो में अनेको श्रापो का वर्णन है तथा हर श्राप में कोई न कोई कारण छुपा था. कुछ श्राप में संसार की भलाई निहित थी तो कुछ श्राप का उनके पीछे छिपी कथाओ में महत्वपूर्ण भूमिका थी.

आज हम आपको ऐसे 5 श्रापो के बारे में बताने जा रहे जिनका इतिहास में तो महत्वपूर्ण योगदान था ही परन्तु इनका प्रभाव वर्तमान में भी प्रमाण के रूप में देख सकते है .

आइये जाने कौन से थे वे प्रमुख 5 श्राप…

प्रसिद्ध ग्रन्थ महाभारत के अनुसार जब युद्ध समाप्त हुआ तो माता कुंती ने पांडवो के पास जाकर उन्हें यह रहस्य बताया की कर्ण उनका भाई था.

सभी पांडव इस बात को सुनकर दुखी हुए. युधिस्ठर ने विधि-विधान पूर्वक कर्ण का अंतिम संस्कार किया तथा शोकाकुल होकर माता कुंती के समीप गए व उसी क्षण उन्होंने समस्त स्त्री जाती को यह श्राप दे डाला की आज से कोई भी स्त्री किसी भी प्रकार की गोपनीय बात का रहस्य नहीं छुपा पाएगी.

जब पांडवो स्वर्गलोक की और प्रस्थान करने हुए तो उन्होंने अपना सारा राज्य अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित के हाथो में सोप दिया. राजा परीक्षित के शासन काल में सभी प्रजा सुखी थी.

एक बार राजा परीक्षित वन में आखेट खेलने को गए तभी उन्हें वहां शमीक नाम के ऋषि दिखाई दिए. वे अपनी तपस्या में लीन थे तथा उन्होंने मौन व्रत धारण क़र रखा था. जब राजा ने उनसे कई बार बोलने का प्रयास करते हुए भी उन्हें मौन पाया तो क्रोध में आकर उन्होंने ऋषि के गले में एक मारा हुआ सांप डाल दिया.

जब यह बात ऋषि शमीक के पुत्र श्रृंगी को पता चली तो उन्होंने राजा परीक्षित को श्राप दिया की आज से सात दिन बाद राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के डसने से हो जायेगी. राजा परीक्षित के जीवित रहते कलयुग में इतना साहस नहीं था की वह हावी हो सके परन्तु उनके मृत्यु के पश्चात ही कलयुग पूरी पृथ्वी पर हावी हो गया.

महाभारत युद्ध के अंत समय में जब अश्वत्थामा ने धोखे से पाण्डव पुत्रों का वध कर दिया, तब पाण्डव भगवान श्रीकृष्ण के साथ अश्वत्थामा का पीछा करते हुए महर्षि वेदव्यास के आश्रम तक पहुंच गए.

तब अश्वत्थामा ने पाण्डवों पर ब्रह्मास्त्र का वार किया. ये देख अर्जुन ने भी अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ा

महर्षि व्यास ने दोनों अस्त्रों को टकराने से रोक लिया और अश्वत्थामा और अर्जुन से अपने-अपने ब्रह्मास्त्र वापस लेने को कहा. तब अर्जुन ने अपना ब्रह्मास्त्र वापस ले लिया, लेकिन अश्वत्थामा ये विद्या नहीं जानता था. इसलिए उसने अपने अस्त्र की दिशा बदलकर अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ की ओर कर दी.

यह देख भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया कि तुम तीन हजार वर्ष तक इस पृथ्वी पर भटकते रहोगे और किसी भी जगह, किसी पुरुष के साथ तुम्हारी बातचीत नहीं हो सकेगी. तुम्हारे शरीर से पीब और लहू की गंध निकलेगी. इसलिए तुम मनुष्यों के बीच नहीं रह सकोगे. दुर्गम वन में ही पड़े रहोगे.

महाभारत में मांडव्य ऋषि का वर्णन आता है. एक बार राजा ने भूलवश न्याय में चूक क़र दी और अपने सेनिको को ऋषि मांडव्य को शूली में चढ़ाने का श्राप दिया.

परन्तु जब बहुत लम्बे समय तक भी शूली में लटकने पर ऋषि के प्राण नहीं गए तो राजा को अपनी भूल का अहसास हुआ तथा उन्होंने ऋषि मांडव्य को शूली से उतरवाया तथा अपनी गलती की क्षमा मांगी.

इसके बाद ऋषि माण्डव्य यमराज से मिलने गए तथा उनसे पूछा की किस कारण मुझे झूठे आरोप में सजा मिली. जब आप 12 वर्ष के थे तो आपने एक छोटे से कीड़े के पूछ में सीक चुभाई थी जिस कारण आपको यह सजा भुगतनी पड़ी.

तब ऋषि माण्डव्य ने यमराज से कहा की किसी को भी 12 वर्ष के उम्र में इस बात का ज्ञान नहीं रहता की क्या धर्म है और क्या अधर्म. क्योकि की तुमने एक छोटे अपराध के लिए मुझे बहुत बड़ा दण्ड दिया है अतः में तुम्हे श्राप देता हु की तुम शुद्र योनि में दासी के पुत्र के रूप में जन्म लोगे. माण्डव्य ऋषि के इस श्राप के कारण यमराज को विदुर के रूप में जन्म लेना पडा.

महाभारत काल में एक बार अर्जुन दिव्यास्त्र पाने के लिए स्वर्ग लोक गया वहां उर्वशी नाम की एक अप्सरा उन पर आकर्षित हो गई. जब उर्वशी ने यह बात अर्जुन को बताई तो उन्होंने उर्वशी को अपनी माता के समान बताया.

इस बात पर उर्वशी क्रोधित हो गई तथा उन्होंने अर्जुन से कहा की आखिर तुम क्यों नपुंसक की तरह बात क़र रहे हो, में तुम्हे श्राप देती हु की तुम नपुंसक हो जाओ तथा स्त्रियों के बीच तुम्हे नर्तक बन क़र रहना पड़े.

जब यह बात अर्जुन ने देवराज इंद्र को बताई तो इंद्र ने अर्जुन को संतावना देते हुए कहा की तुम्हे घबराने की जरूरत नहीं है यहाँ श्राप तुम्हारे वनवास के समय वरदान के रूप में काम करेगा और अज्ञातवास के समय तुम नर्तिका के वेश में कौरवों के नजरो से बचे रहोगे.