माना जाता है कि महाभारतकाल के इस मंदिर में पूजा करने पर पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है !!

कुरुक्षेत्र से मात्र आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित गांव कमौदा में स्थित काम्यकेश्वर मंदिर में रविवारीय शुक्ला सप्तमी को दान व स्नान के लिए उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ इस प्राचीन धार्मिक स्थल के आध्यात्मिक महत्व को बयां करती है। महाभारत काल की याद दिलाता यह मंदिर अनेक खूबियों को समाहित किए हुए है। इस पावन धरा पर स्वयं श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का संदेश दिया उसी हरियाले प्रदेश हरियाणा की धरा पर कुरुक्षेत्र से मात्र आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित गांव कमौदा में स्थित काम्यकेश्वर मंदिर में रविवारीय शुक्ला सप्तमी को दान व स्नान के लिए उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ इस प्राचीन व ऐतिहासिक धार्मिक स्थल के आध्यात्मिक महत्व को बयां करती है। श्रद्धालुओं का मानना है कि इस दिन इस धार्मिक स्थल पर आकर स्नान व दान करने से सब पापों से मुक्ति मिलती है तथा भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। महाभारतकाल की याद दिलाता यह मंदिर अनेक धार्मिक खूबियों को समाहित किए हुए है।

माना जाता है कि लंबे इंतजार के बाद यहां पर पांडवों को स्नान का अवसर प्राप्त हुआ था। विभिन्न धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार रविवारीय शुक्ला सप्तमी को ही सूर्य और उनकी चार संतान यम, यमी, तपती व श्नैश्चर की उत्पलिा हुई थी। इसी दिन सूर्य को त्यागकर घोड़ी का रूप धारण करके विचरण करती हुई उनकी पत्नी रूपा का मिलन भी काम्यकवन में हुआ था। राजा कुरु ने पुण्यक्षेत्र कुरुक्षेत्र को भी रविवारीय शुक्ला सप्तमी को ही प्राप्त किया था तथा इसका नाम धर्मक्षेत्र भी इसी दिन रखा गया। इस दिन किए गए दान, स्नान, उपवास, हवन एवं पूजन से सभी विकारों का पूर्ण विनाश होता है। पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भी देवकी द्वारा रविवारीय शुक्ला सप्तमी के दिन व्रत, स्नान व दान के कारण हुआ था। इसलिए यह माना जाता है कि इस दिन स्नान, दान व व्रत करने वाली स्त्री को संतान प्राप्ति तो होती ही है, संतान वियोग भी नहीं होता।

इस दिन स्नान व दान से समस्त पारिवारिक दोष भी समाप्त हो जाते हैं। गांव कमौदा में स्थित इस मंदिर के पास स्थित पवित्र सरोवर में रविवारीय शुक्ला सप्तमी के दिन असंख्य श्रद्धालु जल में खड़े होकर यह प्रार्थना करते सुनाई देते हैं: भानो भाष्कर मार्तण्ड चंडरश्मे दिवाकर, आरोग्यमायुर्विजयं पुत्रं देहि नमोस्तुते। पांडवों ने जुए में हारे हुए राज्य की पुन: प्राप्ति के लिए भी यहां पर स्नान व शिवाभिषेक किया था। इसी कारण से रविवारीय शुक्ला सप्तमी को विजया सप्तमी भी कहा जाता है। इस दिन कमौदा में स्थित काम्यकेश्वर मंदिर के पवित्र सरोवर में दूर-दराज के क्षेत्रों से अनेक श्रद्धालु स्नान व दान के लिए आते हैं। यहां श्रद्धा से पूजा करने पर निश्चय ही पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है और रविवारीय शुक्ला सप्तमी को स्नान व दान करने से असाध्य रोगों से मुक्ति भी मिलती है।

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