जानिये इस तरह प्राप्त हुआ था भगवान विष्णु को सुदर्शन चक्र

 तो इस तरह प्राप्त हुआ था भगवान विष्णु को सुदर्शन चक्र!!!

सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का शस्त्र है। इसको उन्होंने स्वयं तथा उनके कृष्ण अवतार ने धारण किया है। किंवदंती है कि इस चक्र को विष्णु ने गढ़वाल के श्रीनगर स्थित कमलेश्वर शिवालय में तपस्या कर के प्राप्त किया था।सुदर्शन चक्र अस्त्र के रूप में प्रयोग किया जाने वाला एक चक्र, जो चलाने के बाद अपने लक्ष्य पर पहुँचकर वापस आ जाता है। यह चक्र भगवानविष्णु को ‘हरिश्वरलिंग’ (शंकर) से प्राप्त हुआ था।सुदर्शन चक्र को विष्णु ने उनके कृष्ण के अवतार में धारण किया था। श्रीकृष्ण ने इस चक्र से अनेक राक्षसों का वध किया था। सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का अमोघ अस्त्र है। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि इस चक्र ने देवताओं की रक्षा तथा राक्षसों के संहार में अतुलनीय भूमिका का निर्वाह किया था।

तो इस तरह प्राप्त हुआ था भगवान विष्णु को सुदर्शन चक्र
इस तरह प्राप्त हुआ था भगवान विष्णु को सुदर्शन चक्र

भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र की सहायता से कई राक्षसों और अधम व्यक्तियों को परलोक पहुँचाया | कृष्ण रूप में इसी की सहायता से उन्होंने शिशुपाल जैसे मूर्ख मनुष्य को सबक सिखाया और इसी चक्र ने अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र परीक्षित को अश्वश्थामा के ब्रम्हास्त्र के प्रहार से बचाया था | इसके अलावा और भी कई अवतारों में उन्होंने इस चक्र की मदद से हर अज्ञानी और मूर्ख को सबक सिखाया था लेकिन क्या आपको पता है कि उन्हें यह चक्र कैसे प्राप्त हुआ और उन्हें यह चक्र किसने प्रदान किया था ?यदि नहीं, तो आज हम आपके इन सभी सवालों का समाधान करेंगे |

पौराणिक कथा-

एक बार भगवान विष्णु, शिवजी का पूजन करने के लिए काशी आए। यहां मणिकार्णिका घाट पर स्नान करके उन्होंने एक हजार स्वर्ण कमल फूलों से भगवान शिव की पूजा का संकल्प लिया। अभिषेक के बाद जब भगवान विष्णु पूजन करने लगे तो शिवजी ने उनकी भक्ति की परीक्षा लेने के लिए एक कमल का फूल कम कर दिया। भगवान विष्णु को अपने संकल्प की पूर्ति के लिए एक हजार कमल के फूल चढ़ाने थे।

भगवान विष्णु सुदर्शन चक्र क़े साथ
भगवान विष्णु सुदर्शन चक्र क़े साथ

एक पुष्प की कमी देखकर उन्होंने सोचा कि मेरी आंखें ही कमल के समान हैं इसलिए मुझे कमलनयन और पुण्डरीकाक्ष कहा जाता है। एक कमल के फूल के स्थान पर मैं अपनी आँख ही चढ़ा देता हूं। ऐसा सोचकर भगवान विष्णु जैसे ही अपनी आँख भगवान शिव को चढ़ाने के लिए तैयार हुए, वैसे ही शिवजी प्रकट होकर बोले- हे विष्णु। तुम्हारे समान संसार में कोई दूसरा मेरा भक्त नहीं है।

आज की यह कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी अब से बैंकुठ चतुर्दशी के नाम से जानी जाएगी। इस दिन व्रत पूर्वक जो पहले आपका और बाद में मेरा पूजन करेगा और बैकुंठ लोक की प्राप्ति होगी। तब प्रसन्न होकर शिवजी ने भगवान विष्णु को सुदर्शन चक्र भी प्रदान किया और कहा कि यह चक्र राक्षसों का विनाश करने वाला होगा। तीनों लोकों में इसकी बराबरी करने वाला कोई अस्त्र नहीं होगा।