लंका का निर्माण रावण ने नहीं पार्वती जी ने करवाया था जानिये क्यों ???…

एक बार जब माँ पार्वती और भोले नाथ विष्णु जी के बैकुंठ धाम की यात्रा करके आये तो उसके बाद माँ लक्ष्मी का महल देखकर माता पारवती बहुत प्रभावित हुई कुछ समय बाद जब एक बार भोले नाथ और माँ पार्वती बैठे हुए थे तो माँ पार्वती ने बाबा से कहा की भोले नाथ आप कैलाश पे और शमशानों में रहते हो जबकि आप देवो के देव महादेव हैं सब कुछ होते हुए भी आप इन वनों में रहते हो तो बाबा ने कहा की पार्वती हम वैरागी हैं हमें क्या लेना महलों में रहकर तो माँ पार्वती ने इस बात का हठ किया की नहीं मुझे भी एक ऐसा महल चहिये जो इंद्र  के स्वर्ग से और तीनो लोको से सुन्दर हो |

बाबा भोलेनाथ ने उन्हें बहुत समझाया की पार्वती हम कैलाश में ही ठीक हैं हमें महलों से कोई मोंह नहीं है लेकिन माँ पार्वती नहीं मानी और इस बात का हठ करती रही की मुझे भी महलों में रहना है तो माँ पार्वती के इस हठ को देखकर बाबा ने कहा तो ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा फिर बाबा ने भगवान विशवकर्मा जी को बुलाया और उनसे कहा की हमारे लिए एक सोने का महल बनाओ जिसकी शोभा तीनो लोको में और कहीं न हो तब विशवकर्मा जी ने ख़ुशी ख़ुशी से एक सोने का महल बना दिया फिर बाबा ने माँ को कहा की पार्वती अब हम इसमें तब प्रवेश करेंगे जब इसकी गृह प्रविष्टा  हो जाएगी |

बाबा ने उस महल की ग्रेह परविष्टा करवाई बड़ी धूम धाम से उस महल की गृह प्रविष्टा की गई सभी देवी देवता वहां पे आये हुए थे और उस महल की सुन्दरता को देख कर खुश हो रहे थे लेकिन जिस ऋषि ने उस महल की गृह प्रवेश करवाया था  जब बाबा ने उनसे ये पुछा की मांगो आपको क्या चाहिए दान में तो उन्होंने दान में बाबा से वो सोने का महल ही मांग लिया और बाबा ने खुश होकर उन्हें तथास्तु बोल दिया ये देखकर माँ पार्वती बहुत क्रोधित हुई और उन्होंने उस ऋषि को ये शाप दिया की तुमने भोलेनाथ के भोलेपन का फाएदा उठाया है और हमसे ये महल मांगकर हमें घर से बेघर किया है और मैं तुम्हे ये शाप देती हूँ की जिस महल को तुमने हमसे माँगा है तेरे इसी महल को शिव के 11 वें अवतार के हाथो जलना होगा अर्थात की शिव का 11 वां अवतार तेरे इस महल को जलाकर भस्म कर देगा और फिर जब शिव के 11 अवतार हनुमान जी का जनम हुआ तब उस ऋषि के पुत्र रावण ने हनुमान जी की पूँछ में आग लगाईं थी और हनुमान जी ने रावण की सोने की लंका को जलाकर भस्म कर दिया था

,\रावण  ये अच्छी तरह से जानता था की उसका विनाश श्री राम के हाथों से ही होना है लेकिन वो भी श्री राम जी के हाथों से मुक्ति प्राप्त करना चाहता था इसलिए सब कुछ जान कर भी उसने श्री राम जी से बैर किया और उनके हाथों से रावण का विनाश हुआ और जब रावन का विनाश हुआ था तो उस वक़्त रावण के मूंह से सिर्फ येही शब्द निकला था की श्री राम श्री राम