यहां स्थापित है ‘कामनालिंग’, जानिए मंदिर के शीर्ष पर लगे ‘पंचशूल’ का रहस्य :

यहां स्थापित शिवलिंग को ‘कामनालिंग’ भी कहा जाता है।

यह 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। जहां पर यह मंदिर स्थित है उसे देवघर कहा जाता है । अर्थात देवताओं का घर। यह ज्योतिर्लिंगों सिद्धपीठ है। ऐसाकहा जाता है यहां आने वालों को सभी मनोकामना पूर्ण होता है। यही वजह है कि यहां स्थापित शिवलिंग को ‘कामनालिंग’ भी कहा जाता है।

जानिए पंचशूल का रहस्य :

आमतौर पर शिव भगवान के मंदिर के ऊपर त्रिशूल लगा रहता है लेकिन यहां ऐसा नहीं है। यहां रहस्य का विषय मंदिर के शीर्ष पर लगा ‘पंचशूल’ है। ऐसा कहा जाता है कि रामायण काल में रावण की लंका नगरी के प्रवेश द्वार पर भी ऐसा ही पंचशूल लगा हुआ था।इस पंचशूल को रक्षा कवच भी कहा जाता है। यह मान्यता है कि पंचशूल के कारण ही आज तक देवघर में मंदिर पर किसी प्राकृतिक आपदा का असर नहीं हुआ। देवघर में सभी 22 मंदिरों पर लगे पंचशूलों को साल में एकबार शिवरात्रि के दिन नीचे उतारा जाता और फिर विशेष पूजा के बाद स्थापित कर दिया जाता है।

मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

पौराणिक कथा अनुसार, एक बार शिव को प्रसन्न करने के लिए रावण ने हिमालय पर कठोर तप किया। वह भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए एक-एक करके अपने सिर को काटते जा रहा था। जैसे ही उसने 10वां सिर काटना चाहा, तब भगवान शिव प्रकट हो गये और उससे वर मांगने को कहा। कथा के मुताबिक रावण ने भगवान शिव से ‘कामनालिंग’ लंका ले जाने का वर मांगा।शिव भगवान ने रावण को ‘कामनालिंग’ ले जाने का वर दे दिया लेकिन शर्त रख दिया कि वह रास्ते में जमीन पर नहीं रखेगा। अगर जमीन पर रख दिया तो वे वहीं विराजमान हो गए।

देवघर में विराजमान हुए भोलेनाथ :

जैसे ही इस बात की जानकारी लगी रावण ‘कामानलिंग’ लेकर लंका जा रहा है, सभी देवता चिंतित हो गए तथा विष्णु के पास पहुंचे। विष्णु ने देवताओं की बात सुन एक माया रची व वरुण देव को आचमन के जरिये रावण के पेट में घुसने को कहा। रावण जब याचमन कर शिव भगवान को लंका ले जाने लगा तो विष्णु की माया के कारण देवघर के पास उसे लघुशंका लग गई।

कथा के रावण को रोक पाना बहुत मुश्किल हो रहा था। उस दौरान उसने एक ग्वाले को देखा। ग्वाले को देखने के बाद रावण ने शिवलिंग को थोड़ी देर को पकड़ने को कहा और वह लघुशंका के लिए चला गया। ऐसा कहा जाता है कि रावण कइ घंटों तक लघुशंका करता रहा, जो आज भी वहां एक तालाब के रुप में मौजूद है। इधर, ग्वाला रूप में खड़े विष्णु भगवान ने शिवलिंग वहीं पर रखकर स्थापित कर दिया।

रावण जब लौटा तो उसने देखा शिवलिंग जमीन पर रखा हुआ है। उसके बाद रावण ने शिवलिंग को उठाने की कई बार कोशिश की, लेकिन वह उठा नहीं सका। उसके बाद रावण ने गुस्से में शिवलिंग को अंगूठे से धरती के अंदर दबा दिया और वह लंका चला गया।ऐसा बताया जाता है कि तब से ही यहां पर शिवलिंग स्थापित है, जिसे ‘कामनालिंग’ के नाम से जाना जाता है।