जानिये कहाँ पर भैरव साक्षात् पीते है मदिरा और कर देते है बोतले खाली…

मध्य प्रदेश के उज्जैन के कालभैरव का यह मंदिर लगभग छह हजार साल पुराना माना जाता है। यह एक वाम मार्गी तांत्रिक मंदिर है। वाम मार्ग के मंदिरों में माँस, मदिरा, बलि, मुद्रा जैसे प्रसाद चढ़ाए जाते हैं। प्राचीन समय में यहाँ सिर्फ तांत्रिको को ही आने की अनुमति थी। कालान्तर में ये मंदिर आम लोगों के लिए खोल दिया गया। कुछ सालो पहले तक यहाँ पर जानवरों की बलि भी चढ़ाई जाती थी। लेकिन अब यह प्रथा बंद कर दी गई है। अब भगवान भैरव को केवल मदिरा का भोग लगाया जाता है।

इस मंदिर की कहानी बड़ी दिलचस्प है स्कन्द पुराण के अनुसार चारो वेदों के रचियता ब्रह्मा जी ने जब पांचवें वेद की रचना करने का फैसला किया तो परेशान देवता उन्हें रोकने के लिए महादेव की शरण में गए उनका मानना था की सृष्टि के लिए पांचवे वेद की रचना ठीक नहीं है लेकिन ब्रह्मा जी ने महादेव की भी बात नहीं मानी कहते है इस बात पर शिव क्रोधित हो गए गुस्से के कारण उनके तीसरे नेत्र से एक ज्वाला प्रकट हुई इस ज्योति ने काल भैरव का रौद्र रूप धारण किया, और ब्रह्माजी के पांचवे सिर को धड़ से अलग कर दिया काल भैरव ने ब्रह्मा जी का अहंकार तो दूर किया लेकिन उन पर ब्रह्म हत्या का दोष लग गया इस दोष से मुक्ति पाने के लिए भैरव दर दर भटके लेकिन उन्हें मुक्ति नहीं मिली शिव ने उन्हें शिप्रा नदी में स्नान कर तपस्या करने को कहा तब उन्हें दोष से मुक्ति मिली और वो हमेशा के लिए उज्जैन में शिप्रा नदी के किनारे स्थित हो गए |

 

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है की यहाँ पर भगवान काल भैरव साक्षात रूप में मदिरा पान करते है। जैसा की हम जानते है काल भैरव के प्रत्येक  मंदिर में भगवान भैरव को मदिरा प्रसाद के रूप में चढ़ाई जाती है। लेकिन उज्जैन स्तिथ काल भैरव मंदिर में जैसे ही शराब से भरे प्याले काल भैरव की मूर्ति के मुंह से लगाते है तो देखते ही देखते वो शराब के प्याले खाली हो जाते है।

काल भैरव को मदिरा पिलाने का सिलसिला सदियों से चला आ रहा है। यह कब, कैसे और क्यों शुरू हुआ, यह कोई नहीं जानता।

मंदिर में काल भैरव की मूर्ति के सामने झूलें में बटुक भैरव की मूर्ति भी विराजमान है। बाहरी दिवरों पर अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित है। सभागृह के उत्तर की ओर एक पाताल भैरवी नाम की एक छोटी सी गुफा भी है।

कहते है की बहुत सालो पहले एक अंग्रेज अधिकारी ने इस बात की गहन तहकीकात करवाई थी की आखिर शराब जाती कहां है। इसके लिए उसने प्रतिमा के आसपास काफी गहराई तक खुदाई भी करवाई थी। लेकिन नतीजा कुछ भी नहीं निकला। उसके बाद वो अंग्रेज भी काल भैरव का भक्त बन गया।

 

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