पढ़ें होली से जुड़ी पौराणिक कथाएं!!!

होली से जुड़ी पौराणिक कथाएं!!!

होली का त्योहार प्रेम और सद्भावना से जुड़ा त्योहार है जिसमें अध्यात्म का अनोखा रूप झलकता है। इस त्योहार को रंग और गुलाल के साथ मनाने की परंपरा है। मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व बहुत ही उल्लास का पर्व होता है। होली को मनाने की परंपरा कब शुरू हुई इसके ऐतिहासिक व प्रामाणिक साक्ष्य तो नहीं मिलते लेकिन होली के मनाने के पिछे जो कारण हैं, उन से जुड़ी कथाएं हिंदू धर्म ग्रंथों में जरूर मिलती हैं। आइये आपको बताते हैं होली के त्यौहार से जुड़ी कुछ कथाओं के बारे में।

भक्त प्रह्लाद व होलिका की कथा

होली के पर्व की कथाएं तो अनेक हैं लेकिन जो सबसे प्रचलित कथा है वह है भक्त प्रह्लाद की। वही भक्त प्रह्लाद जो अपने पिता हरिण्यकश्यपु से बगावत कर भगवान की सत्ता में यक़ीन करता है। होता यूं है कि हरिण्यकश्यपु दैत्यराज था उसने कठोर तपस्या कर देवताओं से यह वरदान प्राप्त कर लिया कि वह न धरती पर मरेगा न आसमान, न दिन में मरेगा न ही रात में, न अस्त्र से होगी हत्या न शस्त्र से,  न मरेगा बाहर न मरेगा घर में, न मार सकेगा पशु कोई उसे न मर सकेगा नर से। यह वरदान पाकर वह खुद को अमर समझने लगा और अत्याचार करने लगा, वह खुद को भगवान कहने लगा और लोगों को उसे भगवान मानने पर मजबूर करने लगा। कोई उसके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं करता था।

प्रह्लाद और होलिका
प्रह्लाद और होलिका

ऐसे में उसका स्वयं का पुत्र प्रह्लाद जो कि बालक ही था वह उसके खिलाफ हो गया। हरिण्यकश्यपु से यह बर्दाश्त नहीं हुआ उसने प्रह्लाद को अनेक यातानाएं दी लेकिन भगवान उसकी हर घड़ी मदद करते और उसका विश्वास और भी दृढ़ हो जाता। हरिण्यकश्यपु को सूझ नहीं रहा था ऐसे में उसकी बहन होलिका कहते हैं उसके पास एक चद्दरनुमा वस्त्र या कवच था जिसे ओढ़ने के बाद उसे अग्नि जला नहीं सकती थी। अब यह तय हुआ कि होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर बैठेगी व वह अग्नि में समाप्त हो जायेगा। लेकिन यहां भी भगवान ने उसका साथ दिया और जैसे ही आंच प्रह्लाद तक पंहुची बड़े जोर का तूफान आया और होलिका के कवच ने प्रह्लाद को ढक लिया व होलिका अग्नि में भस्म हो गई इस प्रकार होली का यह त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है।

राक्षसी ढुंढी का वध

कहते हैं राजा पृथु के राज्यकाल में ढुंढी नाम की एक बहुत की ताकतवर व चालाक राक्षसी थी, वह इतनी निर्मम थी की बच्चों तक को खा जाती। उसने देवताओं की तपस्या कर यह वरदान भी प्राप्त किया था कि उसे को देव, मानव, अस्त्र-शस्त्र नहीं मार सकेगा और न ही उस पर गर्मी, सर्दी व वर्षा आदि का कोई असर होगा। इसके बाद तो उसने अपने अत्याचार और भी बढ़ा दिये। किसी को भी उसका वध करने में सफलता नहीं मिल रही थी। सभी उससे तंग आ चुके थे। लेकिन ढुंढी भगवान शिव के शाप से भी पीड़ित थी। इसके अनुसार बच्चे अपनी शरारतों से उसे खदेड़ सकते थे व उचित समय पर उसका वध भी कर सकते थे। जब राजा पृथु ने राज पुरोहितों से कोई उपाय पूछा तो उन्होंने फाल्गुन पूर्णिमा के दिन का चयन किया क्योंकि यह समय न गर्मी का होता है न सर्दी का और न ही बारिश का।

राक्षसी ढुंढी का वध
राक्षसी ढुंढी का वध

उन्होंने कहा कि बच्चों को एकत्रित होने की कहें। आते समय अपने साथ वे एक-एक लकड़ी भी लेकर आयें। फिर घास-फूस और लकड़ियों को इकट्ठा कर ऊंचे ऊंचे स्वर में मंत्रोच्चारण करते हुए अग्नि की प्रदक्षिणा करें। इस तरह जोर-जोर हंसने, गाने व चिल्लाने से पैदा होने वाले शोर से राक्षसी की मौत हो सकती है। पुरोहित के कहे अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा के दिन वैसा ही किया गया। इस प्रकार बच्चों ने मिल-जुल कर धमाचौकड़ी मचाते हुए ढुंढी के अत्याचार से मुक्ति दिलाई। मान्यता है कि आज भी होली के दिन बच्चों द्वारा शोरगुल करने, गाने बजाने के पिछे ढुंढी से मुक्ति दिलाने वाली कथा की मान्यता है।

भगवान शिव व पार्वती से जुड़ी कथा

भगवान शिव व पार्वती
भगवान शिव व पार्वती

देवी पार्वती चाहती थीं कि उनका विवाह भगवान शिव से हो जाये पर शिवजी अपनी तपस्या में लीन थे। ऐसे में कामदेव पार्वती की सहायता के लिए आए। कामदेव ने शिव की तपस्या भंग कर दी जिससे शिवजी क्रोधित हो गए और उनके क्रोध की ज्वाला में कामदेव का शरीर भस्म हो गया। इसके बाद शिवजी ने पार्वती को देखा। पार्वती की आराधना सफल हुई और शिवजी ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया। इस कथा के आधार पर होली की आग में वासनात्मक आकर्षण को प्रतीकत्मक रूप से जला कर सच्चे प्रेम की विजय का उत्सव मनाया जाता है। कामदेव के भस्म होने पर उनकी पत्नी ने विलाप किया और शंकर भगवान से कामदेव के लिए जीवनदान की गुहार की। भोलेनाथ इस पर प्रसन्न हुए और उन्होंने कामदेव को पुनर्जीवित कर दिया। मान्यता के मुताबिक इस दिन रंगों का त्योहार मनाया जाता है।

राक्षसी पूतना के वध की कथा

राक्षसी पूतना के वध की कथा भी होली के इस पर्व से जोड़ी जाती है। कहते हैं जब कंस के लिये यह आकाशवाणी हुई कि गोकुल में उसे मारने वाले ने जन्म ले लिया है तो कंस ने उस दिन पैदा हुए सारे शीशुओं को मरवाने का निर्णय लिया। इस काम के लिये उसने पुतना राक्षसी को चुना। पुतना बच्चों को स्तनपान करवाती जिसके बाद वे मृत्यु को प्राप्त हो जाते लेकिन जब उसने श्री कृष्ण को मारने का प्रयास किया तो श्री कृष्ण ने पूतना का वध कर दिया। यह सब भी फाल्गुन पूर्णिमा के दिन हुआ माना जाता है जिसकी खुशी में होली का पर्व मनाया जाता है।

राक्षसी पूतना का वध
राक्षसी पूतना का वध

saloni nagar

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