हवा में झूलते में इस मंदिर के 70 पिलर, अंग्रेज भी नहीं खोज सके थे मिस्ट्री!!!

हवा में झूलते में इस मंदिर के 70 पिलर, अंग्रेज भी नहीं खोज सके थे मिस्ट्री!!!

आस्था और विश्वास पर टिका आंध्र प्रदेश के अनंतपुर का एक मंदिर आज भी धर्म और विज्ञान के लिये अबूझ पहेली बना हुआ है। दक्षिण भारत के प्रमुख मंदिरों में से एक लेपाक्षी मंदिर वैसे तो अपने वैभवशाली इतिहास के लिये प्रसिद्ध है, लेकिन मंदिर से जुड़ा एक चमत्कार आज भी लोगों के लिये चुनौती बना है।लेपाक्षि (अनंतपुर) में भारत के आन्ध्र प्रदेश राज्य के अन्तर्गत के अनंतपुर जिले का एक गाँव है। यह हिन्दुपुर से १५ किमी पूर्व में तथा बंगलुरु से १२० किमी उत्तर में स्थित है। यह स्थान सांस्कृतिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

लेपाक्षी मंदिर
लेपाक्षी मंदिर

 

कैसे पड़ा ‘लेपाक्षी’ नाम
लेपाक्षी इलाके के नाम के पीछे एक कहानी है कि वनवास के दौरान भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता यहां आए थे। सीता का अपहरण कर रावण अपने साथ लंका लेकर जा रहा था, तभी पक्षीराज जटायु ने रावण से युद्ध किया और घायल हो कर इसी स्थान पर गिरे थे। बाद में जब श्रीराम सीता की तलाश में यहां पहुंचे तो उन्होंने ‘ले पाक्षी’ कहते हुए जटायु को अपने गले लगा लिया। ले पाक्षी एक तेलुगु शब्द है जिसका मतलब है ‘उठो पक्षी’।

झूलता हुआ चमत्कारी खंभा

विशाल लेपाक्षी मंदिर कलाकृति का एक जीवंत नमूना है। मंदिर के मध्य एक नृत्य मंडप है, जो 70 खंभों पर टिका है। 69 खंभे तो सामान्य हैं, लेकिन एक खंभा हवा में झूल रहा है। यह खंभा मंडप की छत से जुड़ा है, लेकिन जमीन के कुछ सेंटीमीटर पहले ही खत्म हो गया।मंदिर के झूलते हुए खंभे को लेकर लोगों में समय के साथ विश्वास बढ़ा और अब विश्वास मान्यता का रूप ले चुका है। दर्शनार्थी मंदिर आते हैं तो इस खंबे का दर्शन जरूर करते हैं। कहा जाता है कि अगर कोई इंसान खंबे के इस पार से उस पार तक कोई कपड़ा ले जाए, तो उसकी मुराद पूरी हो जाती है।

लेपाक्षी मंदिर का झूलता खंभा
लेपाक्षी मंदिर का झूलता खंभा

मंदिर से जुड़ी अन्य मान्यता

जिस पर्वत पर यह मंदिर बना है, उसका रामायण में जिक्र है। रावण जिस वक्त सीता का अपहरण करने के बाद लंका जा रहा था, उस वक्त जटायु ने इसी पर्वत पर रावण को रोका था और युद्ध किया था। युद्ध में जटायु घायल हो गया था।यहां एक पैर का निशान भी है, जिसको लेकर अनेक मान्यताएं हैं। कोई इसे राम का पैर तो कोई सीता के पैर का निशान मानते हैं। बताते हैं कि ये वही स्थान है, जहां जटायु ने राम को रावण का पता बताया था।मंदिर का सबसे रहस्यमय हिस्सा नृत्य मंडप है। कुछ लोग इस मंडप को शिव और पार्वती के विवाह से भी जोड़ते हैं, क्योंकि पौराणिक कथाओं के मुताबिक महादेव और पार्वती का विवाह इसी जगह पर हुआ था।

मंदिर से जुड़े अन्य तथ्य

लेपाक्षी मंदिर को विजयनगर के राजाओं ने बनवाया था। दक्षिणी आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में स्थित यह मंदिर हिन्दुपुर के 15 किलोमीटर पूर्व और उत्तरी बेंगलुरू से लगभग 120 किलोमीटर की दूरी पर है। मंदिर एक कछुआ के खोल की तरह बने एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। इस मंदिर में इष्टदेव श्री वीरभद्र है। वीरभद्र, दक्ष यज्ञ के बाद अस्तित्व में आए भगवान शिव का एक क्रूर रूप है। इसके अलावा शिव के अन्य रूप अर्धनारीश्वर, कंकाल मूर्ति, दक्षिणमूर्ति और
त्रिपुरातकेश्वर यहां भी मौजूद हैं। यहां देवी को भद्रकाली कहा जाता है। मंदिर 16 वीं सदी में बनाया गया और एक पत्थर की संरचना है। मंदिर विजयनगरी शैली में बनाया गया है।

लेपाक्षी मंदिर से 200 दूर मेन रोड पर एक ही पत्थर से बनी विशाल नंदी प्रतिमा है जो की 8. 23 मीटर (27 फ़ीट) लम्बी, 4.5 मीटर (15 फ़ीट) ऊंची है।  यह एक ही पत्थर से बनी नंदी की सबसे विशाल प्रतिमा है जबकि एक ही पत्थर से बनी दूसरी सबसे बड़ी प्रतिमा है

नंदी की सबसे विशाल प्रतिमा
नंदी की सबसे विशाल प्रतिमा

विभद्र मंदिर परिसर में एक ही पत्थर से बनी विशाल नागलिंग प्रतिमा भी स्थापित है जो की संभवतया सबसे विशाल नागलिंग प्रतिमा हैं। इस काले ग्रेनाइट से बनी प्रतिमा में एक शिवलिंग के ऊपर सात फन वाला नाग फन फैलाय बैठा है।विभद्र मंदिर परिसर में स्तिथ राम पदम जबकि कइयों का मानना है की यह माता सीता के पैरों के निशाँ है।

विशाल नाग लिंग प्रतिमा
विशाल नाग लिंग प्रतिमा

 

राम पदम
राम पदम