जानिये महाभारत के प्रमुख पात्र गुरु द्रोणाचार्य के जन्म से जुड़ा अनूठा रहस्य !!! माँ के गर्भ से नहीं बल्कि एक बर्तन से हुआ जन्म !!!

मां के गर्भ से नहीं हुआ था द्रोणाचार्य का जन्म !!!

हमारा पौराणिक इतिहास ऐसी कई कहानियों और घटनाओं से भरा पड़ा है, जिस पर आज के समय में विश्वास करना लगभग नामुमकिन सा है। क्या आज के समय में हम सोच सकते हैं कि यज्ञ में से संतान की उत्पत्ति हो, क्या ये संभव है कि किसी को अपनी मृत्यु और मृत्यु के कारण से जुड़ी भविष्यवाणी हो। क्या इस बात पर यकीन कर पाएंगे कि कोई स्त्री भूमि से जन्मी हो और फिर भूमि में समा गई। ये बात भी अविश्वसनीय लगती है कि किसी स्त्री को यह वरदान प्राप्त हो कि हर साल उसका कौमार्य वापस आ जाएगा।

कुछ वैसे ही मां के गर्भ के बिना किसी बच्चे का जन्म हो जाने जैसी बात भी कल्पनाओं का ही हिस्सा मात्र लगती हैं। दुर्भाग्यवश आज के समय में बहुत से ऐसी संतानें हैं जिनके पिता ने उन्हें कुबूल नहीं किया, या फिर उन्हें अपने जीवन का हिस्सा नहीं बनाया लेकिन फिर भी उनका जन्म पिता के वीर्य और मां के गर्भ से ही हुआ।

लेकिन अगर आपको ये कहा जाए कि पौराणिक कहानियों में ऐसे पात्रों का भी समावेश है जिनका जन्म तो पिता के वीर्य से हुआ है लेकिन उन्हें मां का गर्भ नहीं मिल पाया। सुनने में यह बिल्कुल काल्पनिक लगता है लेकिन यकीन मानिए आगे की स्लाइड्स में आप ऐसे कई चर्चित पौराणिक चरित्र के बारे में पढ़ने जा रहे हैं जिनका जन्म बिना मां के गर्भ के हुआ है।

गुरु द्रोणाचार्य महाभारत के एक प्रमुख पात्र थे। कौरवों व पांडवों को अस्त्र-शस्त्र चलाने की शिक्षा गुरु द्रोणाचार्य ने ही दी थी। महाभारत के आदि पर्व के अनुसार, गुरु द्रोणाचार्य देवताओं के गुरु बृहस्पति के अंशावतार थे। द्रोणाचार्य महर्षि भरद्वाज के पुत्र थे। महापराक्रमी अश्वत्थामा इन्हीं का पुत्र था। गुरु द्रोणाचार्य के जन्म की कथा का वर्णन महाभारत में किया गया है, जो इस प्रकार है-

बर्तन से पैदा हुए थे गुरु द्रोणाचार्य
एक बार महर्षि भरद्वाज जब सुबह गंगा स्नान करने गए, वहां उन्होंने घृताची नामक अप्सरा को जल से निकलते देखा। यह देखकर उनके मन में विकार आ गया और उनका वीर्य स्खलित होने लगा। यह देखकर उन्होंने अपने वीर्य को द्रोण नामक एक बर्तन में एकत्रित कर लिया। उसी में से द्रोणाचार्य का जन्म हुआ था। महर्षि भरद्वाज ने पहले ही आग्नेयास्त्र की शिक्षा अपने शिष्य अग्निवेश्य को दे दी थी। अपने गुरु के कहने पर अग्निवेश्य ने द्रोण को आग्नेय अस्त्र की शिक्षा दी।

परशुराम ने दिए थे अस्त्र-शस्त्र
जब द्रोणाचार्य शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, तब उन्हें पता चला कि भगवान परशुराम ब्राह्मणों को अपना सर्वस्व दान कर रहे हैं। द्रोणाचार्य भी उनके पास गए और अपना परिचय दिया। द्रोणाचार्य ने भगवान परशुराम से उनके सभी दिव्य अस्त्र-शस्त्र मांग लिए और उनके प्रयोग की विधि भी सीख ली।