पहले माता को जंजीर से बाँधा था, आप चढ़ाते है सोने-चाँदी के तले… जानिए इस अद्भुत मंदिर के बारे मे..!!!

कानपुर के पास एकमाता के मंदिर में श्रद्धालु, सोने-चांदी के बने तालों का चढ़ावा चढ़ाते हैं। शायद आपको यह सुनकर हैरानी होगी लेकिन यह सच है। पूजा का यह अनोखा रिवाज, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 80 किलोमीटर दूर कानपुर के बंगाली मोहाल क्षेत्र के काली माता मंदिर की परंपरा बन चुका है।

काली मंदिर के मुख्य पुजारी रवीन्द्र नाथ की मानें तो 1949 में इस मंदिर का निर्माण हुआ और तभी से यहां इस रिवाज का पालन किया जा रहा है। उन्होंने आगे बताया कि मंदिर में आने वाले श्रद्धालु आमतौर पर लोहे के बने ताले अर्पित करते हैं। लेकिन नवरात्रि के दिनों में लोग यहां सोने, चांदी के बने तालों का चढ़ावा भी चढ़ाते हैं। मंदिर में हर दिन करीब 500 भक्त आते हैं और देवी दुर्गा की विशालकाय प्रतिमा के सामने ताले अर्पित करते हैं। ताले सीधे प्रतिमा के सामने नहीं रखे जाते, बल्कि प्रतिमा से कुछ दूर बने खंभों में लगी रस्सियों में बांधे जाते हैं। इस अनोखी परंपरा के पीछे एक दिलचस्प कहानी भी है।

ऐसी मान्यता है कि मंदिर के पहले पुजारी ताराचंद जिन्होंने मंदिर का निर्माण कराया था, ने देवी की प्रतिमा को जंजीर और ताले मे बांध दिया था जब देवी के एक उत्कट भक्त हत्या के झूठे मुकदमे मे फंस गए थे। ताराचंद ने प्रतिज्ञा की कि जब तक देवी भक्त को आशीर्वाद नहीं देंगी और उसे निर्दोष साबित नहीं करेंगी वह ताला जंजीर नहीं खोलेंगे। भक्त को जेल हो जाने के बाद ताराजी ने सामान्य पूजा और आरती नहीं की और देवी को जंजीर तथा ताले में बंधा छोड़ दिया। ऐसा कई महीनों तक चला। जब फैसला भक्त के पक्ष में आया और अदालत ने उसे छोड़ दिया तब से इस मंदिर में ताले का चढ़ावा चढ़ाने की शुरुआत हुई जो आज तक जारी है।

मंदिर के एक अन्य पुजारी केदार कुमार ने कहा कि अपने हाथों में ताले लिये बड़ी संख्या में भक्तजन मंदिर के परिसर में आते हैं ओर देवी के सामने अपनी समस्यों के समाधान और उसी तरह के आशीर्वाद के लिये प्रार्थना करते हैं जैसा उन्होंने अपने उस भक्त को दिया था जिसे अदालत ने बरी कर दिया था। नवरात्रि के दिनों में, यहां भक्तों की संख्या हजारों में पहुंच जाती है और सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर से भक्त अपनी मनोकामना लेकर इस मंदिर में आते हैं।

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