आज पढ़ें आखिर शनिदेव से क्यों डरते हैं लोग !!!

आखिर शनिदेव से क्यों डरते हैं लोग!!!

शनिदेव शायद हिंदू धर्म में सबसे ज्यादा विवादित देवता हैं। लोगों के बीच शनि को लेकर जितनी भ्रान्तियां और डर व्याप्त है उतना किसी और देवता को लेकर नहीं है। ज्योतिष में शनिग्रह को शनिदेव का प्रतीक माना गया है और उसकी चाल के आधार पर ही शनिदेव के प्रभावों की गणना की जाती है।

शनि का जन्म:
शनि को सूर्य और उनकी दूसरी पत्नी छाया का पुत्र माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक शनि के श्यामवर्ण के कारण सूर्य ने उन्हें अपना पुत्र मानने से इनकार कर दिया और उन्हें मंदगामी हो जाने और क्रूरतापूर्ण दृष्टि रखने का शाप दे दिया।

पिता से बैर:
माता छाया के पिता द्वारा किए जाने वाले अपमान से दुखी शनि के भीतर उनके लिए शत्रुभाव पैदा हुआ। शनि ने शिव की घोर तपस्या की और उनसे अपने पिता से सात गुना अधिक शक्तिशाली होने का वरदान प्राप्त किया। माना जाता है कि काशी विश्वनाथ में शनि द्वारा ही स्थापित शिवलिंग है जहां उन्होंने घोर तपस्या की थी।

शनि से डर क्यों:
कहते हैं शनि के प्रभाव में आने से व्यक्ति जबर्दस्त विपरीत परिस्थितियों में घिर जाता है। धन हानि तो होती है, सामाजिक मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा आदि का भी ह्रास होता है। कहते हैं शनि के प्रभाव से तो खुद भगवान शिव भी नहीं बच सके थे। राजा हरिश्चंद्र को भी शनि के प्रभाव में आकर ही दर-दर की ठोकरें खानी पड़ीं।
लेकिन वास्तविकता यह है कि लोगों के बीच शनि को लेकर जबर्दस्त अंधविश्वास और डर व्याप्त है। शनि जीवन का शिक्षक है, यह धैर्य, परिश्रम, न्याय और अनुशासन की प्रेरणा देता है। अपने दायित्वों का निर्वहन करने वालों को शनि के कुप्रभावों का सामना नहीं करना पड़ता, बल्कि उन्हें इसका लाभ ही मिलता है।

शनिदेव
शनिदेव

शनि की ढैया:
ढाई साल की अवधि की ढैया कहा जाता है। शनि की ढैया का अर्थ है कि व्यक्ति पर ढाई सालों तक शनि का प्रभाव। ज्योतिषशास्त्र के नियमानुसार जब गोचर में शनि किसी राशि या आठवें भाव में होता है तब ढैय्या लगता है। कुछ ज्योतिषशास्त्री इसे लघु कल्याणी ढैय्या के नाम से भी संबोधित करते हैं।

आमतौर पर ढैय्या को अशुभ फलदायी कहा गया है, परंतु यह सभी स्थिति में अशुभ नहीं होता। कुछ स्थितयों में यह शुभ और मिला-जुला फल भी देता है। ज्योतिषशास्त्र कहता है कि अगर कुण्डली में चन्द्र और शनि शुभ स्थिति में है तो ढैय्या के दौरान आपके जीवन में कष्ट की अपेक्षा सुख का प्रतिशत अधिक होगा। कुल मिलाकर कहें तो ढैय्या के कुप्रभाव से आप काफी हद तक बचे रहेंगे।

शनिदेव
शनिदेव

शनि की साढ़े साती:
ढैया की तरह ही शनि की साढ़े साती भी है। इसमें शनि का प्रभाव साढ़े सात वर्षों तक बना रहता है। मान्यता के अनुसार जब शनिदेव चन्द्र राशि पर गोचर से अपना भ्रमण करते हैं तो साढेसाती मानी जाती है, इसका प्रभाव राशि में आने के तीस माह पहले से और तीस माह बाद तक अनुभव होता है।हर मनुष्य को तीस साल में एक बार साढ़े साती का सामना अवश्य करना पड़ता है। यदि यह साढ़े साती धनु, मीन, मकर, कुम्भ राशि में होती है, तो कम पीड़ाजनक होती है, यदि यह साढ़े साती चौथे, छठे, आठवें, और बारहवें भाव में होगी, तो जातक को अवश्य दुखी करेगी।

शनि संबन्धी रोग:
माना जाता है कि कुछ विशेष रोग शनि के प्रभाव के चलते अधिक पीड़ादायी बन जाते हैं। शनि को वायु विकार, दांत और हड्डियों से जुड़े रोगों का कारक माना जाता है।

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