शिवजी ने नहीं लिया कोई भी अवतार, फिर भी हैं उनके इतने रूप!!! जानिये!!

भगवान शिव की इन आठ स्वरुप में समाया है पूरा संसार !

हिन्दू धर्म मान्यताओं भगवान शिव स्वयंप्रकृति का रूप है। यही कारण है कि शिव एक मात्र ऐसे देवता हैं, जिन्होंने कभी अवतार नहीं लिया।ग्रंथों के अनुसार शिव सभी देवताओं को उनके कार्य के लिए आदेश देते हैं। इसलिए महादेव देह और जगत में आठ रूपों में समाए हैं। शिव के इन आठ रूपों या मूर्तियों में जगत वैसे ही समाया है, जैसे किसी माला के धागे में मोती पिरोए जाते हैं।आईए भगवान शिव के इन स्वरुप के बारे में थोड़ा विस्तार से जानते है।

शिव प्रतिमा होती है आठ तरह की
शिव प्रतिमा होती है आठ तरह की

शर्व (Sharva) :- पूरे जगत को धारण करने वाली पृथ्वीमयी मूर्ति के स्वामी शर्व है, इसलिए इसे शिव की शार्वी प्रतिमा भी कहते हैं। सांसारिक नजरिए से शर्व नाम का अर्थ और शुभ प्रभाव भक्तों के हर को कष्टों को हरने वाला बताया गया है।

भीम (Bheema) : – शिव की आकाशरूपी मूर्ति है, जो बुरे और तामसी गुणों का नाश कर जगत को राहत देने वाली मानी जाती है। इसके स्वामी भीम है। यह भैमी नाम से प्रसिद्ध है। भीम नाम का अर्थ भयंकर रूप वाले भी हैं, जो उनके भस्म से लिपटी देह, जटाजूटधारी, नागों के हार पहनने से लेकर बाघ की खाल धारण करने या आसन पर बैठने सहित कई तरह से उजागर होता है।

उग्र (Ugra) : – वायु रूप में शिव जगत को गति देते हैं और पालन-पोषण भी करते हैं। इसके स्वामी उग्र है, इसलिए यह मूर्ति औग्री के नाम से भी प्रसिद्ध है। उग्र नाम का मतलब बहुत ज्यादा उग्र रूप वाले होना बताया गया है। शिव के तांडव नृत्य में भी यह शक्ति स्वरूप उजागर होता है।

भगवान शिव की इन आठ मूर्तियों में समाया है पूरा संसार !
भगवान शिव की इन आठ मूर्तियों में समाया है पूरा संसार !

भव (Bhava) : – शिव की जल से युक्त मूर्ति पूरे जगत को प्राणशक्ति और जीवन देने वाली है। इसके स्वामी भव है, इसलिए इसे भावी भी कहते हैं। शास्त्रों में भी भव नाम का मतलब पूरे संसार के रूप में ही प्रकट होने वाले देवता बताया गया है।

पशुपति (Pashupati) : – यह सभी आंखों में बसी होकर सभी आत्माओं की नियंत्रक है। यह पशु यानी दुर्जन वृत्तियों का नाश और उनसे मुक्त करने वाली होती है। इसलिए इसे पशुपति भी कहा जाता है। पशुपति नाम का मतलब पशुओं के स्वामी बताया गया है, जो जगत के जीवों की रक्षा व पालन करते हैं।

रुद्र (Rudra) :- यह शिव की अत्यंत ओजस्वी मूर्ति है, जो पूरे जगत के अंदर-बाहर फैली समस्त ऊर्जा व गतिविधियों में स्थित है। इसके स्वामी रूद्र है। इसलिए यह रौद्री नाम से भी जानी जाती है। रुद्र नाम का अर्थ भयानक भी बताया गया है, जिसके जरिए शिव तामसी व दुष्ट प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखते हैं।

भगवान शिव के स्वरूप
भगवान शिव के स्वरूप

ईशान (Ishana) : – यह सूर्य रूप में आकाश में चलते हुए जगत को प्रकाशित करती है। शिव की यह दिव्य मूर्ति ईशान कहलाती है। ईशान रूप में शिव ज्ञान व विवेक देने वाले बताए गए हैं।

महादेव (Mahadeva) : – चन्द्र रूप में शिव की यह साक्षात मूर्ति मानी गई है। चन्द्र किरणों को अमृत के समान माना गया है। चन्द्र रूप में शिव की यह मूर्ति महादेव के रूप में प्रसिद्ध है। इस मूर्ति का रूप अन्य से व्यापक है। महादेव नाम का अर्थ देवों के देव होता है। यानी सारे देवताओं में सबसे विलक्षण स्वरूप व शक्तियों के स्वामी शिव ही हैं।