ऐसा मंदिर जहां रावण वध के बाद प्रभु श्रीराम ने किया था तप :

एक ऐसा मंदिर जिन्हें भगवान ने स्वयं प्रकट होकर किया था सिद्ध!

सनातन धर्म के अनुसार प्रभु श्री राम विष्णु के 7वें अवतार हैं।राजनीतिक सत्ता एवं उसके संघर्ष के चलते भारत की सीमाओं में हमेशा बदलाव होता रहा, लेकिन धार्मिक परंपराओं से भारत के एक राष्ट्र के रूप में विकास करने में आदि गुरु शंकराचार्य का बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया।

उन्होंने नवीं शताब्दी के प्रारंभ में देश के चार दिशाओं में चार धाम उत्तर में केदारनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम, पूर्व में जगन्नाथपुरीत तथा पश्चिम में श्रृंगेरी मठ की स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य ने कर, भौगोलिक सीमाओं को काफी हद तक सुनिश्चित करने के साथ ही, देशवासियों से इन चारों धामों का तीर्थाटन करने का आवाह्न किया जिससे राष्ट्रीय एकता को बल मिला।

ऐसे में देवभूमि उत्तराखंड के देवप्रयाग जहां भागीरथी एवं अलकनंदा नदी मिलकर गंगा का निर्माण करती हैं। इस संगम तट पर आदि गुरु शंकराचार्य ने अपने उत्तराखंड भ्रमण के दौरान लंबा प्रवास किया तथा इस स्थान पर ही पूर्व से प्रभु श्री राम यानि रघुनाथ ने भी कठोर तप किया था।

क्योंकि उस समय वह रावण वध के बाद रावण के एक ब्राह्मण होने के कारण ब्राह्मण हत्या के अभिशाप से ग्रस्त थे। ऐसे में मुक्ति के लिए इस स्थान पर प्रभु श्री रामचंद्र जी ने कठोर तप किया, यहां भगवान की मूर्ति अकेले ही है, यहां उनके साथ न सीता माता हैं, न हनुमान हैं।

लेकिन मान्यता के मुताबिक हनुमान जैसे सच्चे सेवक श्री राम जी कहां साथ छोड़ते हैं।ऐसा कहा जाता है कि वह भी प्रभु की इच्छा के बगैर यहां देवप्रयाग पहुंचे और जिस स्थान पर भगवान राम तपस्या में लीन थे, उनके ठीक पीछे छिप कर बैठ गए इसीलिए रघुनाथ मंदिर देवप्रयाग के ठीक पीछे हनुमान जी का मंदिर भी है।

वहीं इसके अलावा आदि गुरु शंकराचार्य ने चार धामों के अतिरिक्त 108 विश्वमूर्ति यानि ऐसे विराट मंदिरों की स्थापना की जिनके मंदिर के रूप में भगवान द्वारा स्वयं स्थापित होने की मान्यता रही है। उत्तराखंड में ऐसे 3 मंदिर हैं, जिनमें रघुनाथ मंदिर देवप्रयाग , नरसिंह मंदिर जोशीमठ तथा भगवान श्री बद्रीनाथ शामिल हैं।

ऐसा कहा जाता है कि इन स्थानों पर भगवान ने स्वयं प्रकट होकर स्थान को सिद्ध किया, इन 108 मंदिरों में एक मंदिर नेपाल में मुक्तिनाथ का मंदिर है।इस मंदिर की झील से शालिग्राम भगवान की पिंडिया निकलती है।

रघुनाथ मंदिर द्रविड शैली में बना हुआ है। देवप्रयाग में 11वीं शताब्दी के प्रारंभ में ही यहां विशिष्टा द्वैतवाद के जनक रामानुजाचार्य जी ने कुछ समय यहां रुक कर तपस्या की थी। रामानुजाचार्य जी के संबंध में ऐसा कहा जाता है की उनकी भक्ति परंपरा में रामानंद और कबीर दास जैसे संत हुए।

वहीं रामानुजाचार्य ने यहां प्रभु श्री रघुनाथ जी, देवप्रयाग, संगम तथा देवभूमि उत्तराखंड के आध्यात्मिक महत्व का वर्णन करते हुए 11 पदों की रचना की। सभी पद तमिल भाषा में रघुनाथ मंदिर की दीवारों पर शिला-पट के रूप में आज भी छपा हैं।

देवप्रयाग एक छोटा मगर रमणीक तथा ऐतिहासिक कस्बा है। यहां के अधिकांश ब्राह्मण शंकराचार्य जी के साथ केरल से यहां बद्रीनाथ की पूजा के प्रयोजन से यहां आए। जो शीतकाल में देवप्रयाग और ग्रीष्म में बद्रिकाश्रम में प्रवास करते हैं।