आखिर क्यों नहीं होती ब्रह्मा जी की पूजा…!!!

आखिर क्यों नहीं होती ब्रह्मा जी की पूजा…!!!

जगत के रचयेता ब्रह्मा जी
जगत के रचयेता ब्रह्मा जी

ब्रह्मा ने इस जगत की रचना की पर फिर भी उनका सिर्फ एक ही मंदिर है वो है पुष्कर में तो आइये आज हम जानते है क्यों ब्रह्मा जी का एक ही मंदिर है और उनकी पूजा वर्जित मानी जाती है। पुष्कर का मतलब है वो तालाब जिसका निर्माण पुष्प यानि फूलों से होता है। पुराणों में वर्णन है कि एक बार ब्रह्मा के मन में धरती की भलाई के लिए यज्ञ करने का ख्याल आया। तत्पश्चात स्थान का चुनाव करने के लिए उन्होंने अपनी बांह से निकले हुए एक कमल को धरती लोक की ओर भेज दिया। कहते हैं जिस स्थान पर वह कमल गिरा वहां ही ब्रह्माजी का एक मंदिर बनाया गया है। यह स्थान है राजस्थान का पुष्कर शहर, जहां उस पुष्प का एक अंश गिरने से तालाब का निर्माण भी हुआ था।ब्रह्माजी ने ध्यान दिया कि यज्ञ का समय तो निकल रहा है, यदि सही समय पर आरंभ नहीं किया तो इसका असर अच्छा कैसे होगा। परन्तु उन्हें यज्ञ के लिए एक स्त्री की आवश्यकता थी, इसलिए उन्होंने एक स्थानीय ग्वाल बाला से शादी कर ली और यज्ञ में बैठ गए।

सावित्री थोड़ी देर से पहुंचीं। लेकिन यज्ञ में अपनी जगह पर किसी और औरत को देखकर गुस्से से पागल हो गईं। उन्होंने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि इस पृथ्वी लोक में तुम्हारी कहीं पूजा नहीं होगी। यहां का जीवन तुम्हें कभी याद नहीं करेगा। सावित्री के इस रुप को देखकर सभी देवता लोग डर गए। उन्होंने उनसे विनती की कि अपना श्राप वापस ले लीजिए। लेकिन उन्होंने नहीं लिया। जब गुस्सा ठंडा हुआ तो सावित्री ने कहा कि इस धरती पर सिर्फ पुष्कर में आपकी पूजा होगी। कोई भी दूसरा आपका मंदिर बनाएगा तो उसका विनाश हो जाएगा।

ब्रह्मा जी मंदिर पुष्कर
ब्रह्मा जी मंदिर पुष्कर

यज्ञ के दौरान सावित्री पहुंच गई थीं जिनके श्राप के बाद आज भी उस तालाब की तो पूजा होती है लेकिन ब्रह्मा की पूजा नहीं होती।देवी सावित्री के श्राप की वजह से आज भी ब्रह्मा जी की पूजा नहीं होती है । बस श्रद्धालु दूर से ही उनकी प्रार्थना कर लेते हैं।

लोग अपने घरों में ब्रह्मा जी की तस्वीर नहीं रखते। कहते हैं कि जिन पांच दिनों में ब्रह्मा जी ने यहां यज्ञ किया था वो कार्तिक महीने की एकादशी से पूर्णिमा तक का वक्त था। और इसीलिए हर साल इसी महीने में यहां इस मेले का आयोजन होता है। ये है तो एक आध्यात्मिक मेला लेकिन वक्त के हिसाब से इसका स्वरूप भी बदला है। कहा ये भी जाता है कि इस मेले का जब पूरी तरह आध्यात्मिक स्वरूप बदल जाएगा तो पुष्कर का नक्शा इस धरती से मिट जाएगा। वो घड़ी होगी सृष्टि के विनाश की।