जानना चाहते है शिव का साक्षात निवास ??? तो यह पोस्ट ज़रुर पढ़ें !!!!

टांगीनाथ, जहां है साक्षात शिव का निवास!!!!

झारखंड के गुमला जिले में भगवान परशुराम का तप स्थल है।यह जगह रांची से करीब 150 किमी दूर है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान परशुराम ने यहां शिव की घोर उपासना की थी। यहीं उन्होंने अपने परशु यानी फरसे को जमीन में गाड़ दिया था। इस फरसे की ऊपरी आकृति कुछ त्रिशूल से मिलती-जुलती है। मान्यता है महर्षि परशुराम ने यहीं अपने परशु यानी फरसे को गाड़ दिया था। स्थानीय लोग इसे त्रिशूल के रूप में भी पूजते हैं।

टांगीनाथ शिव त्रिशुल
टांगीनाथ शिव त्रिशुल

आश्चर्य की बात ये है कि इसमें कभी जंग नहीं लगता।खुले आसमान के नीचे धूप, छांव, बरसात- का कोई असर इस त्रिशूल पर नहीं पड़ता है। आदिवासी बहुल ये इलाका पूरी तरह उग्रवाद से प्रभावित है। ऐसे में यहां अधिकतर सावन और महाशिवरात्रि के दिन ही यहां शिवभक्तों की भीड़ उमड़ती है। शिव शंकर के इस मंदिर को टांगीनाथ धाम के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि टांगीनाथ धाम में साक्षात भगवान शिव निवास करते हैं।

जंगल में स्थ‍ित है मंदिर

टांगीनाथ एक आकर्षक, पवित्र और महत्त्वपूर्ण तीर्थधाम है, जो कि भगवान शिव से सम्बन्धित है। यह पवित्र स्थान झारखण्ड राज्य में स्थित है। टांगीनाथ में लगभग 200 अवशेष हैं, जिसमें शिवलिंग और देवी-देवताओं की मूर्तियाँ, विशेषकर दुर्गा, महिषासुर मर्दानि और भगवती लक्ष्मी, गणेश, अर्द्धनारीश्वर, विष्णु, सूर्य देव, हनुमान और नन्दी बैल आदि की मूर्तियाँ प्रमुख हैं। इसके साथ ही साथ पत्थर के जलपात्र, कुम्भ आदि भी यहाँ हैं। टांगीनाथ की सबसे बड़ी विशेषता एक महाविशाल त्रिशूल है। इससे बड़ा त्रिशूल शायद ही कहीं और दिखाई दे। टांगीनाथ को ‘टांगीनाथ महादेव’ और ‘बाबा टांगीनाथ’ के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ छोटे एवं बड़े कई प्रकार के लगभग 60 शिवलिंग हैं।

टांगीनाथ धाम
टांगीनाथ धाम

पौराणिक महत्व
त्रेता युग में जब भगवान श्रीराम ने जनकपुर में आयोजित सीता माता के स्वयंवर में शिव जी का धनुष तोड़ा तो वहां पहुंचे भगवान परशुराम काफी क्रोधित हो गए. इस दौरान लक्ष्मण से उनकी लंबी बहस हुई और इसी बीच जब परशुराम को पता चला कि भगवान श्रीराम स्वयं नारायण ही हैं तो उन्हें बड़ी आत्मग्लानि हुई।

शनिदेव से भी जुड़ी है गाथा
टांगीनाथ धाम का प्राचीन मंदिर रखरखाव के अभाव में ढह चुका है और पूरा इलाका खंडहर में तब्दील हो गया है लेकिन आज भी इस पहाड़ी में प्राचीन शिवलिंग बिखरे पड़े हैं। यहां मौजूद कलाकृतियां- नक्काशियां और यहां की बनावट देवकाल की कहानी बयां करती हैं। साथ ही कई ऐसे स्रोत हैं, जो त्रेता युग में ले जाते हैं। वैसे एक कहानी और भी है। कहते हैं कि शिव इस क्षेत्र के पुरातन जातियों से संबंधित थे। शनिदेव के किसी अपराध के लिए शिव ने त्रिशूल फेंक कर वार किया तो वह इस पहाड़ी की चोटी पर आ धंसा। लेकिन उसका अग्र भाग जमीन के ऊपर रह गया. जबकि त्रिशूल जमीन के नीचे कितना गड़ा है, यह कोई नहीं जानता।