पढ़िए; कैसे एक भील के बलिदान ने बना दिया उसे भगवान शंकर का सबसे प्रिय भक्त…!!!

एक वक़्त की बात है एक पर्वत पर शिवजी का एक बहुत ही सुन्दर मंदिर था | वहां बहुत से लोग शिवजी की पूजा के लिए आते थे | इनमें दो खास भक्त थे जो रोज़ाना भोलेनाथ की पूजा करने आया करते थे | एक था ब्राह्मण और दूसरा था भील | ब्राह्मण प्रतिदिन शिवजी का अभिषेक करता, उन पर फूल पत्तियां चढ़ाता, गूगल जलाता और चन्दन का लेप करता |

बाबा भोलेनाथ
बाबा भोलेनाथ

वहीँ एक बार भील कुमार कण्णप्प मंदिर में भगवान शंकर की मूर्ति देख कर सोचने लगा की  भगवान इस वन में अकेले हैं। कहीं कोई पशु इन्हें कष्ट न दे। शाम हो गई थी। कण्णप्प धनुष पर बाण चढ़ाकर मंदिर के द्वार पर पहरा देने लगा। सवेरा होने पर उसे भगवान की पूजा करने का विचार आया किंतु वह पूजा करने का तरीका नहीं जानता था।

वह वन में गया, पशु मारे और आग में उनका मांस भून लिया। मधुमक्खियों का छत्ता तोड़कर शहद निकाला। एक दोने में शहद और मांस लेकर कुछ पुष्प तोड़कर और नदी का जल मुंह में भरकर मंदिर पहुंचा। मूर्ति पर पड़े फूल-पत्तों को उसने पैर से हटाया। मुंह से ही मूर्ति पर जल चढ़ाया, फूल चढ़ाए और मांस व शहद नैवेद्य के रूप में रख दिया।

शिव शंकर भोलेनाथ
शिव शंकर भोलेनाथ

उस मंदिर में रोज की तरह जब सुबह  ब्राहमण पूजा करने आया तो उसने देखा मंदिर में नित्य ही मांस के टुकड़े रहते थे यह देख ब्राहमण दुखी होता। एक दिन वह छिपकर यह देखने बैठा कि यह करता कौन है? उसने देखा कण्णप्प आया और वो समझ गया की यह सब यह भील करता है । बस ऐसा ही नित्य चलता रहा।

एक बार भगवान भोलेनाथ ने सोचा की में देखना चाहता हूँ की इन दोनों भक्तों में से उनका सच्चा भक्त कौन है। तो इसलिए भक्तों की परीक्षा लेने के लिए शिवजी ने अपनी एक आँख फोड़ ली | ब्राह्मण नित्य समय पर पूजा करने आया | उसने देखा शिवजी की एक आँख नहीं है | पर उसने ध्यान नहीं दिया और पूजा करके वह अपने घर लौट आया | उसके

 शिवजी
शिवजी

बाद भील आया | जब उसने देखा की शिवजी की एक आँख नहीं है और वहां से रक्त बह रहा है उस समय मूर्ति के एक नेत्र से रक्त बहता देख उसने पत्तों की औषधि मूर्ति के नेत्र पर

लगाई, किंतु रक्त बंद नहीं हुआ। तब कण्णप्प ने अपना नेत्र तीर से निकालकर मूर्ति के नेत्र पर रखा। रक्त बंद हो गया। तभी दूसरे नेत्र से रक्त बहने लगा। कण्णप्प ने दूसरा नेत्र भी अर्पित कर दिया। यह सब देख शंकरजी प्रकट हुए और कण्णप्प को हृदय से लगाते हुए उसकी नेत्रज्योति लौटा दी और कहा भील ही मेरा सच्चा भक्त है | ‘ब्राह्मण को यह अच्छा न लगा | उसने सोचा –में ब्राह्मण हूँ, भाँती-भाँती के बहुमूल्य पदार्थो से भगवान की पूजा करता हूँ, फिर भी भगवान मुझे छोड़कर इस भील से प्रसन्न हैं | उसने शिवजी से पूछा

 शिवजी
शिवजी

‘भगवन, क्या आप मुझसे असंतुष्ट है ? में ऊँचे कूल में पैदा हुआ हूँ तथा बहुमूल्य पदार्थो से आपकी पूजा करता हूँ, जब की यह भील निकृष्ट और अपवित्र पदार्थो से आपकी उपासना

करता है, फिर भी आप इसे चाहते हैं |शिवजी ने उत्तर दिया- ‘ब्राह्मण, तुम ठीक कहते हो, परन्तु इस भील का जितना स्नेह मुझ पर है उतना तुम्हारा नहीं |’भोलेनाथ ने ब्राहमण से कहा- मुझे पूजा पद्धति नहीं, श्रद्धापूर्ण भाव ही प्रिय है।

और इस तरह शिव की कृपा से भील की आँख भी ठीक हो गई और उसके दिव्य चक्षु भी खुल गए |

॥ जय महाकाल ॥

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