निराले प्रभु का निराला श्रृंगार; पढ़िए भगवान शिव के श्रृंगार के पीछे के रहस्य और महत्ता..!!!

भगवान शिव से जुड़ी कथा (Stories of Lord Shiv)

जब भी बाबा भोलेनाथ का स्मरण होता है तो एक अद्भुत और अलग से श्रृंगार एक वैरागी पुरुष की छवि उभर आती है

ऐसा इसलिए क्योंकि न जाने कितनी ही विचित्र चीजों को अपने शृंगार के रूप में महादेव ने धारण किया हुआ हैं।

लेकिन आपको बता दें भगवान शिव के श्रृंगार में मौजूद हर एक चीज़ का कोई न कोई प्रतीक है,

भगवान शिव के श्रृंगार
भगवान शिव के श्रृंगार

आईये जानते हैं इसके पीछे का सत्य और महत्ता।

भस्म

भस्म शिव जी का प्रमुख श्रृंगार है।

एक ओर यह दर्शाता है की कैसे परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढालना चाहिए?

वही दूसरी ओर भस्म लगाने का वैज्ञानिक कारण यह है कि भस्म शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देती है।

इससे शरीर सर्दी में सर्दी और गर्मी में गर्मी नहीं लगती।

रुद्राक्ष

माना जाता है कि भगवान शिव ने संसार के उपकार के लिए कई वर्षों तक तप किया।

उसके बाद जब उन्होंने अपनी आँखें खोली तो उनके नेत्र से कुछ आंसू जमीन पर गिर गए।

भगवान शिव के श्रृंगार
भगवान शिव के श्रृंगार

इन बूंदों से रुद्राक्ष वृक्ष की उत्पत्ति हुई।

सच्चे मन से भगवान भोले की आराधना करने के बाद रुद्राक्ष धारण करने से तन-मन में सकारात्मकता का संचार होता है।

भगवान शिव के श्रृंगार

नागदेवता

शिव जी गले में नागदेवता धारण करते है।

पुराणों में वर्णन है कि समुद्र-मंथन के समय इन्होंने रस्सी के रूप में कार्य करते हुए सागर को मथा था।

भगवान शिव के श्रृंगार
भगवान शिव के श्रृंगार

वासुकी नाम का यह नाग शिव का परम भक्त था।

इनकी भक्ति से ही प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपने गले में आभूषण की तरह लिपटे रहने का वरदान दिया।

खप्पर

इसका मतलब है कि यदि हमारे द्वारा किसी का भी कल्याण होता है, तो उसको प्रदान करना चाहिए।

भगवान शिव के श्रृंगार के पीछे के रहस्य

पैरों में कड़ा

यह स्थिरता तथा एकाग्रता को दर्शाता है।

डमरू

भगवान शिव के हाथों में विद्यमान डमरू दर्शाता है की इसे बजाने से आकाश, पाताल एवं पृथ्वी एक लय में बंध जाते हैं।

भगवान शिव के श्रृंगार
भगवान शिव के श्रृंगार

त्रिशूल

भगवान शिव का त्रिशूल सत, रज और तम गुणों के सांमजस्य को दर्शाता है।

यह बताता है कि इनके बीच सांमजस्य के बिना सृष्टि का संचालन सम्भव नहीं है।

शीश पर गंगा

जब पृथ्वी की विकास यात्रा के लिए माता गंगा का आव्हान किया गया तब शिव जी ने अपनी जटाओं में गंगा माँ को स्थान दिया।

इस बात से यह सिद्ध होता है कि दृढ़ संकल्प के माध्यम से किसी भी अवस्था को संतुलित किया जा सकता है।

चन्द्रमा

स्वभाव से शीतल चंद्रमा को धारण करने का अर्थ है कि कितनी भी कठिन परिस्थिति क्यों न हो,

लेकिन मन को हमेशा ठंडा ही रखना चाहिए।

 

परम पिता परमेश्वर आप सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें ।

॥ जय महाकाल ॥

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