यहा पर आज भी है ब्रह्माजी के वरदान से बनी मुर्दों को जिंदा करने वाली बावड़ी ,जानिये इसका रहस्य!!

ब्रह्माजी के वरदान से बनी मुर्दों को जिंदा करने वाली बावड़ी, जानिये इसका रहस्य!!

भारतदेश रहस्यों से भरा पड़ा है। यहां एक से बढ़कर एक कहानियां और कथाएं प्रचलित हैं। लेकिन जिसके बारे में हम आज आपको बता रहे हैं वह है एक बावड़ा जो मुर्दो को जिंदा कर देती थी। दरअसल, इस बावड़ी की कथा ब्रम्हाजी से जुड़ी है।यह बावड़ी आज भी राजस्थान के डूंगरपुर जिले से 10 किलोमीटर दूर एक किले के पास है।

यहा पर आज भी है ब्रह्माजी के वरदान से बनी मुर्दों को जिंदा करने वाली बावड़ी ,जानिये इसका रहस्य!!
यहा पर आज भी है ब्रह्माजी के वरदान से बनी मुर्दों को जिंदा करने वाली बावड़ी ,जानिये इसका रहस्य!!

प्रचलित कथा

ब्रह्माजी से वर पाने के उपरांत तारकासुर के तीन पुत्र तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली ने मयदानव के द्वारा तीन पुर (त्रिपुर) तैयार करवाए। इतना ही नहीं, तारकाक्ष के पुत्र हरि ने तपस्या करके ब्रह्माजी से वर मांग कर मुर्दों को जीवित कर देने वाली बावड़ी बनवाई। दैत्य लोग जिस रूप और जिस वेष में मरते थे, उस बावड़ी में डालने पर वे उसी रूप, उसी वेष में जीवित होकर निकल आते थे।

एक आश्चर्य की बात और भी थी, मरने वाला दैत्य उस बावड़ी से जीवित निकलने के बाद पहले से काफी शक्तिशाली हो जाता था। वे विभिन्न स्थानों में देवताओं और उनके गणों को भगाकर वहां अपनी इच्छा के अनुसार विचरने लगे। वे मर्यादाहीन दुष्ट दानव देवताओं के प्रिय उद्यान और ऋषियों के पवित्र आश्रमों को भी तहस-नहस करने लगे। इस प्रकार जब सब लोक पीड़ित होने लगे तो मरुद्गणों को साथ लेकर देवराज इंद्र उन नगरों पर ब्रज प्रहार करने लगे किंतु ब्रह्मा जी के वर के प्रभाव के कारण उन अभेद्य नगरों को तोडऩे में जब देवराज इंद्र समर्थ न हुए तो भयभीत होकर वे अनेक देवताओं को साथ ले ब्रह्माजी के पास गए।

देवताओं सहित देवराज इंद्र की प्रार्थना सुन कर ब्रह्मा जी ने कहा, महादेव जी के सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है जो उन तीनों को मार सके। तदनंतर ब्रह्मा जी के नेतृत्व में इंद्रादि सभी देवता श्री महादेव जी की शरण में गए। भगवान शंकर शरणा पन्नों को भय के समय अभयदान देने वाले और सबके आत्म स्वरूप हैं।भगवान शंकर की आज्ञा पाकर देवता स्वस्थचित्त होकर कहने लगे, देवाधिदेव! आपको नमस्कार है। प्रजापति, इंद्र सहित हम सभी आपकी स्तुति करते हैं। देव! हम मन, वाणी और कर्मों से आपके शरणापन्न हैं, आप हम पर कृपा कीजिए। भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर कहा, देवगण! भय को छोडि़ए और बताइए मैं आपका कौन-सा कार्य करूं?

इस प्रकार जब महादेव जी ने देवताओं को अभयदान दे दिया तब ब्रह्माजी ने हाथ जोड़ कर कहा, सर्वेश्वर! आपकी कृपा से प्रजापति के पद पर प्रतिष्ठित होकर मैंने दानवों को एक महान वर दे दिया था, जिसके कारण उन्होंने सब प्रकार की मर्यादाएं तोड़ दी हैं। तब महादेव जी ने कहा, देवताओ! मैं धनुष बाण धारण करके रथ में सवार हो उनका वध शीघ्र ही करूंगा।

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