क्यो और कैसे मनाते हैं आंवला नवमी का त्योहार और क्या हैं इसके फायदे:

आंवला नवमी का त्योहार दीपावली के बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है। आंवला नवमी को अक्षय नवमी भी कहते है। अक्षय नवमी धात्री और कूष्मांडा नवमी के नाम से भी जानी जाती है। इसे मानाने की क्या मान्यता है तथा इसका व्रत रखने के क्या क्या फायदे हैं आओ जानते हैं इस बारे में संक्षिप्त जानकरी।
 

मान्यता :

  1. पौराणिक मान्यता के मुताबिक कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी से लेकर पूर्णिमा तक भगवान विष्णु आवंले के पेड़ पर निवास करते हैं। इसीलिए इस पेड़ की पूजा की जाती है।
  1. ऐसाभी कहा जाता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण अपनी बाल लीलाओं का त्याग करके वृंदावन की गलियों को छोड़कर मथुरा चले गए थे।
  1. आंवला भगवान विष्णु का सबसे प्रिय फल है तथा आंवले के वृक्ष में सभी देवी देवताओं का निवास होता है इसलिए इसकी पूजा का प्रचलन है।
  1. आयुर्वेद के मुताबिक आंवला आयु बढ़ाने वाला फल है यह अमृत के समान माना गया है इसीलिए हिन्दू धर्म में इसका ज्यादा महत्व है।

फायदे :

  1. आंवले के वृक्ष की पूजन करने से देवी देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस दिन व्रत रखने से संतान की भी प्राप्ति होती है।
  1. यह मान्यता है कि आंवला पेड़ की पूजा कर 108 बार परिक्रमा करने से मनोकामनाएं पूरी होतीं हैं।
  1. इस दिन विष्णु भगवान सहित आंवला पेड़ की पूजा-अर्चना करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। 
  1. अन्य दिनों की तुलना में नवमी पर किया गया दान पुण्य कई गुना अधिक लाभदायक है।
  1. धर्मशास्त्र के मुताबिक इस दिन स्नान, दान, यात्रा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

कैसे मनाते हैं :

  1. आंवले के वृक्ष के नीचे पूर्व दिशा में बैठकर पूजा कर उसकी जड़ में दूध देना चाहिए। इसके बाद पेड़ के चारों ओर कच्चा धागा बांधकर कपूर बाती या फिर शुद्ध घी की बाती से आरती करते हुए सात बार परिक्रमा करनी चाहिए।
  1. इस दिन महिलाएं किसी ऐसे गॉर्डन में जहां आंवले का वृक्ष हो, वहां जाकर वहीं भोजन ग्रहण करती हैं। पूजा-अर्चना के बाद खीर, पूड़ी, सब्जी तथा मिष्ठान आदि का भोग लगाया जाता है। नवमी के दिन महिलाएं भी अक्षत, पुष्प, चंदन आदि से पूजा-अर्चना कर पीला धागा लपेटकर वृक्ष की परिक्रमा लगाती हैं।
  1. आंवला नवमी के दिन परिवार के बड़े-बुजुर्ग सदस्य विधि-विधान से आंवला वृक्ष की पूजा-अर्चना करके भक्तिभाव से पर्व को मनाकर आंवला पूजन के बाद पेड़ की छांव पर ब्राह्मण भोज भी कराते हैं। आंवले के वृक्ष के नीचे ब्राह्मणों को भोजन कराएं और खुद भी उसी वृक्ष के निकट बैठकर भोजन करें।
  1. धात्री वृक्ष (आंवला) के नीचे पूर्वाभिमुख बैठकर ‘ॐ धात्र्ये नमः’ मंत्र से आंवले के वृक्ष की जड़ में दूध की धार गिराते हुए पितरों को तर्पण करने का विधान भी है। इस दिन पितरों के शीत निवारण (ठंड) के लिए ऊनी वस्त्र और कंबल दान किया जाता है।
  1. आंवला नवमी पर उज्जयिनी में कर्क तीर्थ यात्रा और नगर प्रदक्षिणा का प्रचलन भी है। वर्षों पूर्व आंवला नवमी पर उज्जैनवासी भूखी माता मंदिर के सामने शिप्रा तट स्थित कर्कराज मंदिर से कर्क तीर्थ यात्रा का आरंभ कर नगर में स्थित प्रमुख मंदिरों पर दर्शन-पूजन कर नगर प्रदक्षिणा करते थे। कालांतर यह यात्रा कुछ लोगों द्वारा ही की जाती थी बाद में यह परंपरा बन गई।