जानिए आंवला नवमी का पौराणिक रहस्य :

इस वर्ष आंवला नवमी 23 नवंबर को मनाई जा रही है। कार्तिक शुक्ल नवमी को अक्षय नवमी, आंवला नवमी या युगतिथि कहा जाता हैं। यह तिथि युगों-युगों से अक्षय फलदायक मानी जाती है। इसी दिन आंवले के वृक्ष की पूजा कर इसी वृक्ष की छाया में भोजन करने का विधान होता है। 

सारा संसार जब जलमग्न था एवं ब्रह्म देव कमल पुष्प में बैठ कर निराकार परब्रह्मा की तपस्या कर रहे थे. ‘टप, टप, टप, टप’ सारे ब्रम्हांड में ब्रम्हा जी के नेत्रों से, ईश-प्रेम के अनुराग के टपकते अश्रुओं की ध्वनि गूंज उठी और इन्हीं प्रेम अश्रुओं से जन्म हुआ आंवले के वृक्ष का। 

कार्तिक महात्म्य में आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन करने को ‘अन्न-दोष-मुक्ति’ कहा जाता है। श्री हरि को आंवला सर्वाधिक प्रिय है, इसीलिए ही कार्तिक में रोज एक आंवला फल खाने की आज्ञा धर्मशास्त्र देते हैं। 

अब जरा आंवले का सौ प्रतिशत आर्यसत्य भी जान लें- ‘वय:स्थापन’ यह आचार्य चरक कहते है अर्थात सुंदरता को स्तंभित (रोक कर) करने के लिए आंवला अमृत है। बूढ़े को जवान बनाने की क्षमता केवल आंवले में होती है। आखिर इसमें सत्यता कितनी है? इसे विज्ञान की दृष्टि से देखे तो यह शरीर के अंगों में नए कोषाणुओं का निर्माण रुक जाने, कम हो जाने से कार्बोनेट अधिक हो जाता है, जो घबराहट पैदा करता है। आंवला पुराने कोषाणुओं को भारी शक्ति प्रदान करता है और ऑक्सिजन देता है। 

संक्षिप्त में आंवला चिर यौवन प्रदाता, ईश्वर का दिया गया सुंदर प्रसाद है। आंवला एकमात्र वह फल है, जिसे उबालने पर भी विटामिन ‘सी’ जैसे-का-तैसा रहता है। च्यवनप्राश में भी सर्वाधिक आंवले का प्रयोग होता है। आंवले को कम-ज्यादा प्रमाण में खाने से कोई नुकसान नहीं है, फिर थोड़ा-सा शहद डाल कर खाने से अति उत्तम लाभ होता है। 

 
आंवले को आयुर्वेद में त्रिदोषहर कहा गया है। यानी वात, पित्त और कफ इन तीनों को नियंत्रित रखता है आंवला । सिरदर्द, रक्तपित्त, पेचिश, मुखशोथ, श्वेद प्रदर, अपचन जनित ज्वर, वमन, प्रमेह, कामला, पांडु, दृष्टिदोष तथा शीतला जैसे हजारों रोगों में आंवले का उपयोग होता है। आंवला केवल एक फल नहीं, हजारों वर्ष की आयुर्वेदाचार्यों की मेहनत का अक्षयपुण्य फल है।

आंवला नवमी से तुलसी विवाह आरंभ हो कर पूर्णिमा तक शुभ फलदायी होता है।

यह है आंवला नवमी की कथा संक्षेप में- किशोरी नामक कन्या की जनमकुंडली में वैधव्य योग रहता है। अक्षय नवमी को वो किशोरी तुलसी का व्रत करती है। पीपल, तुलसी का पूजा करती है। विलेपी नामक युवक किशारी से प्रेम करता है और किशोरी का स्पर्श होते ही वह मृत्यु को प्राप्त करता है। इधर राजकुमार मुकुंद किशोरी को प्राप्त करने का वरदान सूर्यदेवता से प्राप्त करता है। ईश्वर का लिखा हुआ भाग्य भी पूरा हो जाता है। वैधव्य योग भी पूर्ण होता है और मुकुंद को पत्नी रूप में किशोरी भी प्राप्त हो जाती है।