आज पढ़िए..!!!आरती की थाल में रखी जाने वाली सामग्री का महत्व…!!!!

आज पढ़िए..!!!आरती की थाल में रखी जाने वाली सामग्री का महत्व…!!!!

पूजा के बाद आरती करने की प्रथा है।आरती का थाल पीतल, तांबा, चांदी या सोने का बना होता हैं। इस थाली में दीपक के साथ पूजा के फ़ूल, धूप-अगरबत्ती आदि भी रखे जाते हैं। इसके स्थान पर सामान्य पूजा की थाली भी प्रयोग की जा सकती है।आरती के समय कई सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है, इन सभी के पीछे धार्मिक एवं वैज्ञानिक आधार भी हैं। आइये जानते हैं इन सामग्रियों का महत्व।

  • आरती में इस्तेमाल होने वाले पदार्थ जैसे- रुई, घी, कपूर, फूल, अगरबत्ती,धूपबत्ती ,चंदन शुद्ध और शांति प्रदान करने वाले हैं। इनको जलाने से बाद एक अद्भुत सुगंध वातावरण में फैल जाती है। इससे वातावरण में मौजूद नकारत्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता है।
  • कलश: कलश एक खास आकार का बना होता है। इसके अंदर का स्थान बिल्कुल खाली होता है। मान्यतानुसा इस खाली स्थान में शिव बसते हैं। यदि आरती के समय कलश का प्रयोग करते हैं, तो इसका अर्थ है कि भक्त शिव से एकाकार हो रहे हैं। समुद्र मंथन के समय विष्णु भगवान ने अमृत कलश धारण किया था। इसलिए कलश में सभी देवताओं का वास माना जाता है।

  • जल: जल से भरा कलश देवताओं का आसन माना जाता है। जल को शुद्ध तत्व माना जाता है, जिससे ईश्वर आकृष्ट होते हैं।
  • नारियल: आरती के समय कलश पर नारियल रखते हैं। नारियल की शिखाओं में सकारात्मक ऊर्जा का भंडार पाया जाता है। जब आरती गाते हैं, तो नारियल की शिखाओं में उपस्थित ऊर्जा तरंगों के माध्यम से कलश के जल में पहुंचती है। यह तरंगें काफी सूक्ष्म होती हैं।
  • तांबे की मुद्रा: तांबे में सात्विक लहरें उत्पन्न करने की क्षमता अन्य धातुओं की अपेक्षा अधिक होती है। कलश में उठती हुई लहरें वातावरण में प्रवेश कर जाती हैं। कलश में पैसा डालना त्याग का प्रतीक भी माना जाता है। यदि कलश में तांबे के पैसे डालते हैं, तो इसका अर्थ है कि भक्त में सात्विक गुणों का समावेश हो रहा है।
  • कुमकुम :शास्त्रों में बताया गया है कि पुरुष देवताओं की पूजा में कुमकुम नहीं चढ़ाया जाता है, जबकि देवियों की पूजा कुमकुम के बिना अधूरी मानी जाती है।इसका कारण कुमकुम का एक तरह की सौभाग्य सामग्री होना हैं।

  • सप्तनदियों का जल: गंगा, गोदावरी, यमुना, सिंधु, सरस्वती, कावेरी और नर्मदा नदी का जल पूजा के कलश में डाला जाता है। सप्त नदियों के जल में सकारात्मक ऊर्जा को आकृष्ट करने और उसे वातावरण में प्रवाहित करने की क्षमता होती है। क्योंकि अधिकतर योगी-मुनि ने ईश्वर से एकाकार करने के लिए इन्हीं नदियों के किनारे तपस्या की थी।
  • कलावा: शास्त्रों का ऐसा मत है कि कलावा बांधने से त्रिदेव, ब्रह्मा, विष्णु व महेश तथा तीनों देवियों लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है।
  • पान सुपारी: यदि जल में सुपारी डालते हैं, तो इससे उत्पन्न तरंगें रजोगुण को समाप्त कर देती हैं और भीतर देवता के अच्छे गुणों को ग्रहण करने की क्षमता बढ जाती है। पान की बेल को नागबेल भी कहते हैं।नागबेलको भूलोक और ब्रह्मलोक को जोड़ने वाली कड़ी माना जाता है।
  • तुलसी: आयुर्वेद में तुलसी का प्रयोग सदियों से होता आ रहा है। अन्य वनस्पतियों की तुलना में तुलसी में वातावरण को शुद्ध करने की क्षमता अधिक होती है।

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