जानिए कैसे पड़ा माँ दुर्गा के दूसरे स्वरुप का नाम ब्रह्मचारिणी…!!!

जानिए कैसे पड़ा माँ दुर्गा के दूसरे स्वरुप का नाम ब्रह्मचारिणी…!!!

माँ दुर्गा के दूसरा स्वरुप-ब्रह्मचारिणी
माँ दुर्गा के दूसरा स्वरुप-ब्रह्मचारिणी

नवरात्र पर्व के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है।ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली।इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली।पूर्वजन्म में इस देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी।इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात् ब्रह्मचारिणी नाम से जाना गया।कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे।तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं।इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए।कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं।पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया।कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया।देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या की सराहना की और कहा आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की, आपकी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान शिव आपको पति रूप में प्राप्त होंगे।


इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बाएँ हाथ में कमण्डल रहता है।माँ को खुश करने के लिए ऐसी कन्याओं का पूजन किया जाता है कि जिनका विवाह तय हो गया है लेकिन अभी शादी नहीं हुई है। इन्हें अपने घर बुलाकर पूजन के पश्चात भोजन कराकर वस्त्र, पात्र आदि भेंट किए जाते हैं।
मां की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए।मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्व सिद्धि प्राप्त होती है।इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता।

॥ जय माँ ब्रह्मचारिणी ॥