कैसी रचाई भगवान शंकर ने लीला; श्रीराम के बालरूप के दर्शन के लिए बने मदारी…!!!

धार्मिक कहानियाँ (Religious Stories)

भगवान शंकर (Shankar) और विष्णु (Vishnu) में अनन्य प्रेम है।

जब-जब भगवान विष्णु पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं, तब-तब भोले-भण्डारी भी अपने आराध्य की मनमोहिनी लीला के दर्शन के लिए पृथ्वी पर उपस्थित हुए हैं।

आज हम आपको भगवान शंकर (Shankar) की एक लीला के बारे में बता रहें है की कैसे अपने आराध्य विष्णु (Vishnu) के अवतार श्री राम के दर्शन के लिए भगवान बने मदारी।

श्री हरी विष्णु और महादेव
श्री हरी विष्णु और महादेव

भगवान शंकर बने मदारी

बात तब की है जब श्रीराम भाईयों सहित पैदल चलने लगे, फिर वे एक ही जगह कैसे रह सकते थे।

जिधर मन आए उधर ही राजमहल के द्वार तक दौड़ लगाने लगे।

एक बार भगवान शंकर (Shankar) को श्री राम (Ram) से मिलने का मन हुआ तो वे मदारी के वेष में डमरु बजाते हुए अवध के राजमहल के द्वार पर पहुंचे।

उनके साथ नाचने वाला एक सुन्दर बंदर (कहा जाता है बन्दर और कोई नहीं बल्कि हनुमान जी थे) भी था।

श्री राम का बाल रूप
श्री राम का बाल रूप

मदारी और बंदर का खेल देखने के लिए राजमहल के द्वार पर लोगों की भीड़ जमा हो गई।

डमरु की आवाज सुनकर श्रीराम (Ram) सहित चारों भाई भी महल के द्वार पर आ गए।

तभी मदारी ने जोर से डमरु बजाया और बंदर ने श्रीराम को देखकर दोनों हाथ जोड़ लिए।

यह देखकर सभी भाईयों सहित श्रीराम हंसने लगे।

मदारी जैसे निहाल हो गया।

वह और भी जोर से डमरु बजाने लगा।

डमरु की आवाज के साथ बंदर भी ठुमुक-ठुमुक कर नाचने लगा।।

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भगवान शिव से जुड़ी कथा (Stories of Lord Shiv)

शंकर (Shankar) जी एक तरफ वानररूप (हनुमान (Hanuman) जी को शिव (Shiv) अवतार माना गया है ) में अपने आराध्य के सामने नाच रहे थे और दूसरे तरफ स्वयं ही मदारी बनकर अपने को नचा रहे थे।

सम्पूर्ण सृष्टि को नचाने वाले कौसल्यानन्दन श्रीराम (Ram) नाच से मुग्ध होकर हाथ से ताली बजाकर प्रसन्न हो रहे थे।

अब भगवान ने लीला की। शिशु राम (Ram) मचल उठे–’मुझे यह वानर चाहिए।’ मदारी तो यह चाहता ही था।

अपने आराध्य के चरणों में रहने की अभिलाषा लेकर ही उसने वानररूप धरा था।

महाराज दशरथ के पुत्र की कामना अधूरी कैसे रहती? अब उस वानर की डोर कौसल्यानन्दन के हाथ में थी। नाचें हनुमत नचावें श्रीराम

श्रीराम
श्रीराम

इस प्रकार भगवान शंकर (Shankar) ने कभी देवरूप से, कभी मनुष्यरूप से और कभी वानररूप हनुमान (Hanuman) के रूप में श्रीराम (Ram) की सेवा की और उपासकों के सामने अपने आराध्य की किस प्रकार सेवा की जाती है इसका उदाहरण प्रस्तुत किया।

प्रवनउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानघन।

जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर।।

 

 

॥ जय महाकाल ॥

॥जय श्री राम ॥