पढ़िए भगवान शिव के अलग-अलग रूप और उनके विभिन्न नामों की महिमा, भाग-3…!!!

भगवान शिव से जुड़ी कथा (Stories of Lord Shiv)

भगवान शिव के अलग-अलग रूप और उनके विभिन्न नाम हैं ।

आज हम आपको भगवान शिव शंकर भोलेनाथ (Bholenath) के विभिन्न नामों का अर्थ बता रहें है,आइये जानते है:

खंडपरशु

एक समय की बात है बदरिकाश्रम में नर और नारायण (Narayan) दोनों तप कर रहे थे।

तब उस समय दक्ष यज्ञ का विध्वंस करने के लिए शिव (Shiv) जी ने अपना त्रिशूल छोड़ा।

भगवान शिव के अलग-अलग रूप
भगवान शिव के अलग-अलग रूप

देवयोग से वह त्रिशुल यज्ञ विध्वंस करता हुआ सीधे नारायण (Narayan) की छाती को भेद गया और शिव (Shiv) के पास आ गया।

इससे शिव क्रोधित हुए और तुरंत आकाश मार्ग से नारायण के समीप गए, तब उन्होंने शिव (Shiv) का गला घोंट दिया।

उसी अवसर पर नर ने परशु के आकार के एक तृण खंड को ईषिकावस्त्र से अभिमंत्रित कर शिव जी पर छोड़ा था

और शिव ने उसको अपने महत्प्रभाव से खंडित कर दिया। तब से वह ‘खंडपरशु’ भी कहलाते हैं।

गंगाधर

संसार के हित के लिए भागीरथ जी ने माँ गंगा का आह्वान किया था,

तब उन्हें यह संदेह हुआ कि आकाश से अकस्मात् पृथ्वी पर प्रपात होने से अनेक अनिष्ट हो सकते हैं।

भगवान शिव के अलग-अलग रूप
भगवान शिव के अलग-अलग रूप

अतः भागीरथ जी ने भगवान शंकर (Shankar) से प्रार्थना की और उनकी प्रार्थना से गौरी शंकर ने उन्हें अपने जटामंडल में धारण कर लिया।

इसलिए शिव (Shiv) जी को ‘गंगाधर’ कहते हैं।

भगवान शिव के अलग-अलग रूप

महेश्वर

संपूर्ण देवताओं में प्रधान होने के कारण भी इन्हें महेश्वर (Maheshwar) कहा जाता है।

जो वेदों के आदि में ओंकार रूप से स्थित रहते हैं वह महेश्वर (Maheshwar) कहलाते हैं।

भगवान शिव के अलग-अलग रूप
भगवान शिव के अलग-अलग रूप

रूद्र

संसार में फैले दुःख और उसके समस्त कारणों के नाश करने के लिए में क्रूर रूप धारण करना पड़ता है

और इसी रूद्र (Rudra) रूप को धारण करने से शिव को ‘रूद्र’ कहते हैं।

पितामह

अर्यमा आदि पितरों के तथा इंद्रादि देवों के पिता होने और ब्रह्मा (Brahma) के भी पूज्य होने से शिव जी ‘पितामह’ नाम से विख्यात हैं।

सर्वज्ञ

तीनों लोकों और तीनों काल की संपूर्ण बातों जो कोई नहीं जान सकता उसको सदाशिव जान लेते हैं इसी से उनको ‘सर्वज्ञ’ कहते हैं।

भगवान शिव के अलग-अलग रूप
भगवान शिव के अलग-अलग रूप

परमात्मा

उपर्युक्त संपूर्ण गुणों से संयुक्त होने और समस्त जीवों की आत्मा होने से श्री शिव ‘परमात्मा’ कहलाते हैं।

कपाली

ब्रह्मा के मस्तक को काटकर उसके कपाल को कई दिनों तक कर में धारण करने से भगवान शिव ‘कपाली’ कहे जाते हैं।

 

परम पिता परमेश्वर आप सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें ।

॥ जय महाकाल ॥