माया के जाल से नहीं बच पाए नारद जी भी; जानिए क्यों उन्हें बिताना पड़ा एक स्त्री का जीवन..!!!

भारतीय पौराणिक कथा (Indian Mythological Story)

माया के मोह जाल से तो देवता भी नहीं बच पाए तो फिर बिचारे देवर्षि नारद जी (Narad)  कैसे बचते।

यह माया इतनी प्रबल है कि यह ज्ञानियों को भी मोह में डाल देती है।

स्वयं देवाधिदेव लक्ष्मीपति भगवान विष्णु (Vishnu) भी इस महामाया से अछूते नहीं रहे तो उनके भक्त कैसे रहते।

 

नारद जी
नारद जी

एक बार की बात है भगवान विष्णु (Vishnu) गरुड (Garud) पर नारद (Narad) जी को बैठाकर एक दिव्य रमणीय सरोवर के तट पर ले गये और उनसे उनमें स्नान करने को कहा।

उस सरोवर में जैसे ही देवर्षि ने डुबकी लगायी, वे एक सुंदर युवती के रूप में परिणत हो गये।

सरोवर से निकलने पर उन्हें अपने स्वरूप का ज्ञान विस्मृत हो चुका था।

भगवान विष्णु (Vishnu) वहां से अन्तर्धयान हो चुके थे।

भगवान विष्णु
भगवान विष्णु

इतने में ही तालध्वज नामक एक राजा उधर आ निकला और सुंदर स्त्री के रूप में नारद जी (Narad) को देखकर उसने उनसे प्रणय याचना की।

नारद जी माया के जाल से नहीं बच पाए

नारद जी (Narad) को अपना ज्ञान तो विस्मृत हो ही चुका था, स्त्री के रूप में उन्हें आश्रण की आवश्यकता भी थी, अतः वे राजा तालध्वज की महारानी बन गये।

कालान्तर में वे अनेक पुत्रों की माता भी बने।

उनके अनेक पौत्र भी हुये।

इस प्रकार वे मायाविमोहित हो अपने परिवार में अत्यन्त आसक्त हो गये, उनका दिव्य ज्ञान विस्मृत हो चुका था।

एक बार किसी दूसरे देश के राजा ने तालध्वज के राज्य पर आक्रमण कर दिया।

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भयानक संग्राम में राजा तालध्वज के सभी पुत्र और पौत्र मारे गये।

स्त्री रूप धारी नारदजी (Narad) ने रणभूमि में जाकर अपने पुत्र−पौत्रों को मृत देखा तो विलाप करने लगे।

इतने में वृद्ध ब्राह्मण रूपधारी भगवान विष्णु (Vishnu) ने वहां आकर उनको जगत की नश्वर गति समझाते हुए सरोवर में स्नान कर मृत पुत्र−पौत्रों को तिलांजलि देने को कहा।

तब जैसे ही स्त्रीरूपधारी नारद जी (Narad) ने उस सरोवर में डुबकी लगायी तो वे अपने वास्तविक नारद रूप में आ गये।

भगवान विष्णु (Vishnu) तट पर उनकी वीणा और मृगचर्म लिये खड़े थे।

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इधर राजा तालध्वज अपनी स्त्री को सरोवर से वापस न आया देखकर विलाप करने लगे।

तब भगवान विष्णु (Vishnu) तथा नारद ने आकर उन्हें ज्ञान दिया।

उनकी ज्ञान वार्ता से राजा तालध्वज के मन में वैराग्य भाव उत्पन्न हो गया।

और वे इस संसारी जीवन से मुक्त हुए।

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