क्यों व्यक्ति की मृत्यु के बाद पढ़ा जाता है गरुड़ पुराण; पढ़िए भगवान गरुड़ के जन्म से जुडी कथा..!!!

हिंदी धार्मिक कहानियाँ(Religious Stories in Hindi )

हमारे पुराणों के अनुसार महर्षि वेदव्यास ने कुल 18 पुराणों की रचना की थी।

इन्हीं पुराणों में से एक है गरुड़ पुराण (Garud Puran), जिसका पाठ मृत्यु के पश्चात किया जाता है।

ऐसा इसलिए क्योंकि हिन्दू शास्त्रों के अनुसार कहा जाता है गरुड़ पुराण (Garud Puran) के द्वारा ही आत्मा को इस संसार से मुक्ति मिलती है और वह निर्धारित स्थान की ओर प्रस्थान करती है।

भगवान गरुड़
भगवान गरुड़

ऐसा माना जाता है कि अगर मौत के बाद गरुड़ पुराण (Garud Puran) पढ़ी जाए तो मृत व्यक्ति की आत्मा को शांति और धरती के बंधन से मुक्ति मिलती है।

लेकिन क्या आप ने कभी सोचा कि गरुड़ पुराण (Garud Puran) जिस भगवान गरुड़ (Garud ) पर हैं उनका जन्म कैसे हुआ था?

चलिए आज हम आपको बताते है:

भगवान गरुड़ के जन्म की कहानी

गरुड़ (Garud) के जन्म की यह कहानी कश्यप (Kashyap) ऋषि की दो पत्नियों विनता और कद्रु के साथ शुरू होती है।

एक बार ऋषि कश्यप (Kashyap) ने अपनी पत्नी कद्रु से कहा कि वह संतानोत्पत्ति के लिए एक यज्ञ प्रारंभ करने जा रहे हैं।

भगवान गरुड़
भगवान गरुड़

कश्यप ऋषि ने सबसे पहले कद्रु से पूछा कि उन्हें और कितने पुत्र चाहिए?

इस सवाल के जवाब में कद्रु ने कहा कि उन्हें बहुत सारे पुत्र चाहिए।

ऋषि कश्यप ने जब अपनी दूसरी पत्नी विनता से किया तब विनता ने जवाब दिया कि वह मात्र 2 पुत्रों की कामना करती है।

कश्यप ऋषि ने उन दोनों की इच्छा को स्वीकार कर लिया।

कश्यप ऋषि ने यज्ञ प्रारंभ किया।

यज्ञ पूर्ण होने के बाद कद्रु को हजार अंडज मिले जिनसे उन्हें हजार पुत्र उत्पन्न होने थे।

कद्रु ने सभी अंडों को गर्म पानी में रख दिया और उनकी देखरेख करने लगी।

इसके बाद ऋषि कश्यप ने विनता के दो पुत्रों की उत्पत्ति के लिए यज्ञ प्रारंभ किया।

 भगवान गरुड़
भगवान गरुड़

गरुड़ पुराण

यज्ञ से दो अंडे उत्पन्न हुए।

अपनी पत्नी विनता को अंडे सौंपते हुए कश्यप ऋषि ने कहा कि इनका बहुत ध्यान रखना और कुछ भी हो जाए अपना धीरज मत खोना।

इतना कहकर ऋषि कश्यप हिमालय पर तप करने के लिए प्रस्थान कर गए।

आगे चलकर कद्रु के हजार अंडों में से हजार सांप निकले, जो बहुत ताकतवर थे।

लेकिन समय पूरा होने के बाद भी विनता के अंडों में से कुछ नहीं निकला।

भगवान विष्णु के वाहन भगवान गरुड़
भगवान विष्णु के वाहन भगवान गरुड़

ऐसे में उन्होंने अपना एक अंडा तोड़ दिया।

यह देखने के लिए कि उसमें कुछ है भी या नहीं।

अंडे के भीतर उसे अपना पुत्र दिखाई दिया जिसके शरीर का ऊपरी हिस्सा तो था लेकिन बाकी का हिस्सा मात्र मांस का लोथड़ा था।इस पुत्र का नाम अरुण था।

अरुण ने अपनी मां से कहा-पिता के कहने के बाद भी आपने धैर्य खो दिया और मेरे शरीर का विस्तार नहीं होने दिया।

इसलिए मैं आपको श्राप देता हूं कि आपको अपना जीवन एक सेवक के तौर पर बिताना होगा।

भगवान विष्णु के वाहन भगवान गरुड़
भगवान विष्णु के वाहन भगवान गरुड़

विनता को कद्रु की सेविका बनना पड़ा ।

कुछ दिनों बाद अंडे में से निकले गरुड़ ।

गरुड़ का चेहरा, सिर और चोंच चील की तरह और शरीर इंसान का था।

वह भी अपनी मां के साथ सेवक के तौर पर ही रहा।

गरुड़ बहुत ताकतवर थे और अपनी इच्छानुसार अपना स्वरूप बदल सकता थे।

आगे जाकर भगवान गरुड़ भगवान विष्णु (Vishnu) के वाहन बने ।

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