आज पढ़िए कैसे शुरू हुआ शिर्डी में हिन्दू और मुसलमानों के त्योहार एकसाथ मनाना…!!!!

आज पढ़िए कैसे शुरू हुआ शिर्डी में हिन्दू और मुसलमानों के त्योहार एकसाथ मनाना…!!!!

साईं बाबा

इसके पीछे बाबा की एक कहानी है,आइये पढ़ते है।

एक गांव में गोपालराव नामक एक इंस्पेक्टर थे।गोपाल के पास सब था धन दौलत रुपैया पैसा सब कुछ कमी थी तो बस एक संतान की। इंस्पेक्टर ने संतान की इच्छा से 4 विवाह किए थे लेकिन एक से भी उनको कोई पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई थी। उन्होंने डॉक्टर, नीम-हकीम, वैद्य आदि सभी से इलाज कराया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।एक दिन वे सुबह-सुबह अपने दरवाजे के पास खड़े थे कि तभी गांव का एक मेहतर अपनी पत्नी के साथ वहां से गुजरा। जैसे ही उन दोनों की दृष्टि गोपालराय पर पड़ी, मेहतरानी अपने पति से बोली कि सुबह-सुबह किस निपूते का मुंह देख लिया। अब पता नहीं हम जहां जा रहे हैं वहां पहुंच पाएंगे या नहीं? आज रहने, दो कल चलेंगे।  इंस्पेक्टर गोपालराव के दिल में मेहतरानी की बात तीर की तरह चुभ गई। इस घटना ने इंस्पेक्टर गोपालराव को भीतर से बुरी तरह तोड़ दिया था।

उन्होंने निश्चय कर लिया कि नौकरी छोड़ देंगे और सभी धन-संपत्ति को चारों पत्नियों के बीच बांटकर वे संन्यास ले लेंगे। यह निश्चय करने के बाद उन्होंने त्यागपत्र लिखा और कुर्सी पर बैठे-बैठे ही गहरे विचार में डूब गए। तभी दरवाजे के बाहर गाड़ी रुकने की आवाज सुनाई दी।

गोपालराव ने दरवाजे की ओर देखा तो  उनका मित्र कमरे की ओर आ रहा था। गोपालराव ने खड़े होकर मुस्कराकर स्वागत करते हुए कहा कि इतनी सुबह तुम यहां अचानक कैसे?  रामू बोला कि ट्रेन से अहमदाबाद जा रहा था, लेकिन जैसे ही ट्रेन यहां स्टेशन पर रुकी तभी किसी ने मेरे कान में कहा कि यहीं उतर जा, गोपाल तुम्हें याद कर रहा है। मैं बिना सोचे-समझे यहां उतर उतर गया और घोड़ागाड़ी लेकर यहां आ गया।

गोपालराव ने रामू का स्वागत किया और सभी के हाल-चाल पूछे। तब रामू ने पूछा कि तुम बताओ, सब कुशल तो है? गोपालराव ने निराश होकर कहा कि तुमने यहां आकर ठीक किया मित्र। यदि आज नहीं आते तो फिर कभी मिलना नहीं होता।गोपालराव ने फिर सुबह की घटना और अपने मन की व्यथा सुनाई

रामू ने कहा कि मेरी समझ में आ गया। तुम एक काम करो, अभी ही मेरे साथ शिर्डी चलो। तब दोनों शिर्डी पहुंच गए।

शाम हो रही थी। द्वारिकामाई मस्जिद में दीये जलाए जा रहे थे। सांईंबाबा मस्जिद में चबूतरे पर बैठे थे। अनेक शिष्य उनके पास बैठे थे। तभी गोपाल और रामू  दोनों ने मस्जिद में एकसाथ प्रवेश किया। दोनों को देखकर सांईंबाबा ने मुस्कराकर कहा कि आओ गोपाल, आओ रामू। बहुत देर कर दी तुम दोनों ने। तुम तो सुबह 10 बजे चले थे।  गोपाल और रामू दोनों ने ठिठककर एक-दूसरे की ओर देखा। फिर उन्होंने आगे बढ़कर बाबा के चरण स्पर्श किए। सांईंबाबा ने दोनों को अपने पैरों से ऊपर उठाते हुए कहा कि आज तुम दोनों ने एकसाथ पांव छुए हैं मस्जिद में भी एकसाथ ही कदम रखे हैं। मैं चाहता हूं कि तुम दोनों के मन की मुरादें भी एकसाथ पूरी हों। फिर बाबा ने पास ही खड़े सिद्धीकी से कहा कि सिद्धीकी सुना है कि तुमको आदमी पहचानने का बहुत तजुर्बा है। क्या तुम बता सकते हो कि इन दोनों में से कौन हिन्दू और कौन मुसलमान है? सिद्धीकी ने गौर से देखने के बाद कहा कि बाबा मुझे तो दोनों ही हिन्दू भी और मुसलमान भी दिखाई दे रहे हैं। आज तो मेरी बूढ़ी आंखें धोखा खा रही हैं। बाबा ने कहा कि तुम ठीक कहते हो हाजी सिद्धीकी। ये दोनों हिन्दू भी हैं और मुसलमान भी। मैं भी यह चाहता हूं कि इनका रूप ऐसा ही बना रहे।

रामू का वास्तविक नाम अहमद अली था, लेकिन उसने अपना नाम रामू रख लिया था। बाबा ने दोनों को आशीर्वाद दिया और उनकी मनोकामना पूर्ण होने का आश्वासन भी दिया। बाबा के आशीर्वाद के ठीक 9 महीने बाद दोनों की मन की मुरादें पूरी हुईं। दोनों फिर से बाबा के दरबार में पहुंचे। दोनों ने बाबा के पैर छुए और बाबा से निवेदन किया कि आज से शिर्डी में हिन्दू और मुसलमानों के त्योहार एकसाथ मनाए जाएं। बाबा ने उनका निवेदन स्वीकार कर लिया और इसकी शुरुआत रामनवमी से हुई।

।।ॐ साईं राम।।

 

Deepika Gupta

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