रहस्यों से भरा है दुनिया का यह सबसे ऊंचा मंदिर, जानकर दांतों तले अंगुली दबाएंगे !!

भारत में कई ऐसे मंदिर हैं जो अपनी बनावट और भव्यता के लिए आज भी विश्वविख्यात हैं। इन मंदिरों की संरचनाएं इतनी अद्भुत है कि अति आधुनिक तकनीकों से लैस आज के इंजीनियर्स भी उसे बनाने का तरीका ना तो समझ पाएं हैं और ना ही ढ़ूंढ़ पाए हैं। आप भी इन्हें बनाने की बारीकियां जानकर दांतों तले अंगुली दबाएंगे। यहां हम आपको एक ऐसे शिव मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं जो लगभग एक हजार साल पुरानी है। इस मंदिर की खासियत इसका पुरातन होना नहीं, बल्कि इसे बनाने का तरीका है और जिसे दुबारा बनाने की कल्पना आज भी नहीं की जा सकती। इसी विशेषता के कारण यूनेस्को ने भी इस मंदिर को विश्व का एक खास धरोहर माना ह

रहस्य्मय मंदिर

हम बात कर रहे हैं बृहदेश्वर या बृहदीश्वर (तमिल में) मन्दिर की जो तमिलनाडु के तंजौर में है। यह भगवान शिव का मंदिर है जिसे 11वीं सदी में चोल शासक राजाराज चोल प्रथम ने बनवाया था। इस मंदिर की संरचना अपने आप में एक रहस्य है जिसे समझना आज भी मुमकिन नहीं हो सका है।बृहदेश्वर मंदिर की खास खूबी यह है कि इसे पूरी तरह ग्रेनाइट पत्थर से बनाया गया है। विश्व में यह पहला और एकमात्र ऐसा मंदिर है जो ग्रेनाइट का बना हुआ है। आश्चर्य की बात यह है कि इस मंदिर के 100 किमी तक के दायरे में ग्रेनाइट मौजूद नहीं है। आज भी यह रहस्य है कि आखिर इन पत्थरों को कहां से ढोकर लाया गया होगा।

मंदिर की बनावट और भी हैरान करती है

ग्रेनाइट पत्थरों की विशेषताओं को देखते हुए मंदिर की बनावट और भी हैरान करती है। दरअसल ग्रेनाइट पत्थर स्वभाव से बेहद कठोर होता है और इसलिए उस पर नक्काशी करना उतना ही मुश्किल। इसके बावजूद इस मंदिर की दीवारों और छतों पर खूबसूरत नक्काशी की गई है।इसे बनाने में लगभग 130000 टन ग्रेनाइट का इस्तेमाल हुआ है। करीब एक हजार साल पहले इतनी मात्रा में ग्रेनाइट जुटाना असंभव सा था, जो अगर इसके लिए जुटाया गया तो अपने आप में एक आश्चर्य है और इसीलिए रहस्य का विषय भी।

मंदिर के निर्माण कला की एक विशेषता यह भी है कि इसके गुंबद की परछाई धरती पर नहीं पड़ती। तात्पर्य यह कि दोपहर के समय पूरे मंदिर की परछाई जब जमीन पर बनती है, इसके गुंबद की नहीं। ऐसी किसी संरचना का निर्माण करना या सोचना भी आज भी असंभव सा है, अपने आप में यह एक उत्कृष्ट इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना है। इतना ही नहीं, मंदिर के गुम्बद पर एक पत्थर के ऊपर स्वर्ण-कलश रखा हुआ है और आश्चर्य की बात स्वर्ण-कलश का होना नहीं, बल्कि यह है कि केवल उस पत्थर का वजन 80 टन यानि 2200 मन है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि 66 मीटर (216 फुट) ऊंचे एक मंदिर के गुम्बद पर इतना भारी पत्थर आखिर कैसे रखा गया होगा?

इसके गुंबद की परछाई धरती पर नहीं पड़ती

इस मंदिर के चबूतरे पर नंदी की प्रतिमा है जो पूरे भारत में एक ही पत्थर से निर्मित नन्दी की दूसरी सबसे विशाल प्रतिमा है। नन्दी की यह प्रतिमा 6 मीटर लंबी, 2.6 मीटर चौड़ी और 3.7 मीटर ऊंची है। आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि यह कितना भव्य होगा।बृहदेश्वर मंदिर विश्व में सबसे ऊंचा मंदिर माना गया है। इसे तंजौर के किसी भी कोने से देखा जा सकता है। मंदिर में 13 मंजिलें हैं जबकि हिंदू स्थापित मंदिरों में मंजिलों की संख्या सम होती है जबकि यहां ऐसा नहीं है। मंदिर की दीवारों पर बड़ी ही खूबसूरती से संस्कृत व तमिल आलेख लिखे गए हैं।

नन्दी की दूसरी सबसे विशाल प्रतिमा

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