क्या सच में विश्व का एक ऐसा मंदिर जहां शिव की नहीं, इनके पैर के अंगूठे की होती है पूजा!!!

एक मात्र मंदिर जहां होती है शिव के अंगूठे की पूजा!!!

अचलेश्वर महादेव प्रवेश द्वार
अचलेश्वर महादेव प्रवेश द्वार

वैसे तो इस दुनिया भर में भगवान शिव के कई मंदिर है जो अपने चमत्कारों के कारण प्रसिद्ध भी है। और इसी प्रकार भोलेनाथ के अचलेश्वर नाम से कई मंदिर भी है। जो काफी प्रसिद्ध है। इन्हीं में से एक मंदिर धौलापुर के अचलेश्वर मंदिर जो दिन में तीन बार शिवलिंग अपना रंग बदलते है। इसी के अनुसार माउंट आबू में एक शिव मंदिर है इसकी खास बात यह की यहां भगवान शिव के पैर के अंगूठे की पूजा की जाती है। जोकि विश्व का इकलौता मंदिर माना गया है।राजस्थान के एक मात्र स्टेशन जोकि दूसरा कश्मीर माना गया माउंट आबू जो अपनी खूबसूरती के कारण तो काफी प्रसिद्ध है, साथ ही इस प्राचीन मंदिर के कारण विश्व प्रसिद्ध भी है। हिंदू धर्म की पुराण स्कंद पुराण के अनुसार माना जाता है कि जिस तरह वाराणसी शिव की नगरी है तो यह माउंट आबू भगवान शंकर की उपनगरी है।

भगवन शिव के अंगूठे का निशान
भगवन शिव के अंगूठे का निशान

 

भगवान शिव का अचलेश्वर महादेव मंदिर माउंट आबू से उत्तर दिशा की ओर लगभग 11 किलोमीटर दूर अचलगढ़ की पहाड़ियों पर अचलगढ़ के किले के समीप बना हुआ है। हर शिव मंदिर की तरह इसके द्वार पर भी नंदी की विशाल मूर्ति है। यह मूर्ति केवल मामूली मूर्ति नहीं बल्कि पंच धातु से बनी हुई मूर्ति है। मंदिर के अंदर जाने पर गर्भग्रह पर भगवान शिव के पैर के अंगूठे का निशान पाताल खंड के रुप में उभरा हुआ है।

इस अंगूठे की क्या मान्यता है –

पारम्परिक मान्यता है की इस अंगूठे ने पुरे माउंट आबू के हिस्से को थाम रखा है जिस दिन अंगूठे का निशा गायव हो जायेगा उस दिन माउन्ट आबू का पहाड़ ख़त्म होजायेगा मंदिर के बिशाल चौक में चंपा का बिशाल पेड़ अपनी प्रचीनता को दर्शाता है ।मंदिर की बायीं बाजु की तरफ दो कलात्मक खंभो का धर्मकाटा बना हुआ है ।जिसकी शिल्प कला अद्र्त है पौराणिक काल में जहां आज का आबू  पर्बत स्थित है बहा निचे ब्राट ब्रामण खाई थी जिस के तहत पे बसिष्ठ मुनि रहते थे ।

अचलेश्वर महादेव
अचलेश्वर महादेव

मंदिर की पुराणिक कथा –

एक बार मुनि बशिस्ट की  गाय कामधेनु हरी घास चरते  हुए ब्रहम खाई में गिर गई तो उसे बचाने के लिए मुनि ने स्व्रस्ती गंगा का इस्मरण किया तो बो खाई से ऊपर सतह तक पानी से भर गई और कामधेनु गया गोमुख पर खाई से बहार आगई इस कारन ब्रहम खाई पर ब्रहम आश्रम बना हुआ है इसी कारन बहा शिब के अंगूठे की पूजा होती है ।

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