जानिए शरद पूर्णिमा इतनी खास क्यों है; जाने इस दिन खीर खाने का चिकित्सकीय महत्व..!!!

इस बार शरद पूर्णिमा 5 अक्टूबर गुरुवार को है। हिंदू पुराणों के अनुसार माना जाता है कि शरद पूर्णिमा की रात चांदनी सबसे तेज प्रकाश वाली होती है। शरद पूर्णिमा को लेकर मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा की किरणों से अमृत गिरता है और ये किरणें सेहत के लिए काफी लाभदायक होती हैं। बात करें तो लंकाधिपति रावण शरद पूर्णिमा की रात किरणों को दर्पण के माध्यम से अपनी नाभि पर ग्रहण करता था। इस प्रक्रिया से उसे पुनर्योवन शक्ति प्राप्त होती थी। आइए आज जानते है शरद पूर्णिमा इतनी खास क्यों है और क्या है इस दिन खीर खाने का चिकित्सकीय महत्व।

शरद पूर्णिमा की खास रात
शरद पूर्णिमा की खास रात

पुराणिक मान्यताएं:

  • भगवान को खीर चढ़ाना।
  • पूर्णिमा की चांद को खुली आंखों से नहीं देखना. खौलते दूध से भरे बर्तन में चांद देखते हैं।

  • चन्द्रमा की रोशनी में सूई में धागा डालना।
  • खीर,मिठाई रात भर चांद के नीचे रखना।
  • शरद पूर्णिमा का चांद बदलते मौसम अर्थात मानसून के अंत का भी प्रतीक है. इस दिन चांद धरती के सबसे निकट होता है इसलिए शरीर और मन दोनों को शीतलता प्रदान करता है ।

चिकित्सकीय महत्व

इस दिन व्रत रख कर विधिविधान से लक्ष्मीनारायण का पूजन किया जाता है । खीर बनाकर उसे रात में आसमान के नीचे रख दें ताकि चंद्रमा की चांदनी का प्रकाश खीर पर पड़े । दूसरे दिन सुबह स्नान करके खीर का भोग अपने आराध्य देवों को लगाएं । फिर अपने परिवार में खीर का प्रसाद बांटें । इस

शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहते है
शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहते है

प्रसाद को ग्रहण करने से अनेक प्रकार के रोगों से छुटकारा मिलता है ।

शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा हमारी धरती के बहुत करीब होता है, इसलिए चंद्रमा के प्रकाश में मौजूद रासायनिक तत्व सीधे-सीधे धरती पर गिरते हैं । खाने-पीने की चीजें खुले आसमान के नीचे रखने से चंद्रमा की किरणे सीधे उन पर पड़ती हैं जिससे विशेष पोषक तत्व खाद्य पदार्थों में मिल जाते हैं जो हमारी सेहत के लिए अनुकूल होते हैं । अध्ययन के अनुसार दुग्ध में लैक्टिक अम्ल और अमृत तत्व होता है। यह तत्व किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति का शोषण करता है। चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया और आसान हो जाती है। इसी कारण ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आसमान में रखने का विधान किया है। यह परंपरा विज्ञान पर आधारित है।शोध के अनुसार खीर को चांदी के पात्र में बनाना चाहिए। चांदी में

प्रतिरोधकता अधिक होती है। इससे विषाणु दूर रहते हैं। हल्दी का उपयोग निषिद्ध है। प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम 30 मिनट तक शरद पूर्णिमा का स्नान करना चाहिए। रात्रि 10 से 12 बजे तक का समय उपयुक्त रहता है।

वर्ष में एक बार शरद पूर्णिमा की रात दमा रोगियों के लिए वरदान बनकर आती है। इस रात्रि में दिव्य औषधि को खीर में मिलाकर उसे चांदनी रात में रखकर प्रात: 4 बजे सेवन किया जाता है। रोगी को रात्रि जागरण करना पड़ता है और औषधि सेवन के पश्चात 2-3 किमी पैदल चलना लाभदायक रहता है।

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