सावन शिवरात्रि : करती है कष्टों को दूर , जानिए इसकी व्रत कथा !!!

शिवरात्रि हर महीने में रहती है परन्तु सावन महीने की शिवरात्रि अति महत्वपूर्ण होती है। इस दिन भगवान शिव की आराधना करने से वह स्वयं महामृत्युंजय बनकर उपासक की रक्षा करते है। इस बार सावन मास की शिवरात्रि 19 जुलाई को आरही है। शास्त्रों के मुताबिक इस दिन का अभिषेक अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक फलदायक होता है।
सवान शिवरात्रि की कथा :
पौराणिक कथा के मुताबिक वाराणसी के वन में एक भील रहता था , उसका नाम गुरुद्रुह था। वह वन में रहने वाले प्राणियों का शिकार करते था और उससे ही अपने परिवार जन का पेट भरता था। एक बार शिवरात्रि के दिन वह शिकार पर निकला परन्तु उस दिन उसे कोई प्राणी नहीं मिला। तभी उसे वन में एक झील दिखाई देती है। झील को देखकर वह सोचने लगा की में पेड़ पर चढ़कर शिकार की राह देखता हूँ कोई न कोई प्राणी अवश्य पानी पिने आएगा।

यह सोचकर वह पानी का पात्र भरकर बिल्ववृक्ष पर चढ़ा। उस बिल्ववृक्ष के निचे एक शिवलिंग था। कुछ समय बाद एक हिरणी आई। गुरुद्रुह ने जैसे ही हिरणी का शिकार करने के लिए धनुष पर तीर चढ़ाया तो बिल्ववृक्ष के पत्ते और जल शिवलिंग पर जा गिरे। इस प्रकार रात के प्रथम प्रहार में अनजाने में पूजा होगयी। तभी हिरणी ने उसे देखा और उससे सवाल किया की तुम क्या चाहते हो।
तब वह उत्तर देता है की में तुम्हे मार कर अपने परिवान का पेट भरूंगा। यश सुनकर हिरणी बॉकलती है की मेरे बच्चे मेरी राह देख रहे होंगे , में उन्हें अपनी बहन को सोपकर लोट आउंगी। हिरनी के ऐसा कहने पर शिकारी ने उसे जाने दिया। थोड़ी देर बाद हिरनी की बहन उसे खोजते हुए उस जगा आती है और शिकारी फिर धनुष निकालता है और उसी तरह रात्रि के दूसरे प्रहार में शिवलिंग की पूजा होजाती है। वह हिरनी भी यह बोलकर चली जाती है की में अपने बच्चो को सुरक्षित करके आती हूँ।

कुछ समय बाद हिरन अपनी हिरनी को ढूंढ़ने आता है और फिर इस बार वही सब हुआ और रात्रि के तीसरे प्रहर में शिवलिंग की पूजा होजाती हैं । वह हिरन भी अपने बच्चो को सुरक्षित स्थान पर छोड़कर आने की बात करता है और गुरुद्रुह उसे जाने देता है। जब तीनो हिरन मिले तो प्रतिज्ञाबद्ध होने के कारण शिकारी के पास आगये। शिकारी तीनो को एक साथ देख कर खुश होजाता है और वार करने के अपना धनुष निकालता है और रात्रि के चौथे प्रहर में पुनः शिवलिंग की पूजा होजाती है। इस प्रकार दिनभर गुरुद्रुह भूखा रहा और रातभर जागता रहा साथ ही रात्रि के चारो प्रहर में उससे शिवलिंग की पूजा होगयी तथा शिवरात्रि का व्रत सम्पन्न होगया। जिससे प्रभाव से उसके पाप तत्काल भस्म होगए । पुण्य उदय से उसने सभी हिरणो को मारने का त्याग कर दिया।
तभी उस स्थापित शिवलिंग से भगवान शंकर प्रकट हुए और उन्होंने गुरुद्रुह को वरदान देदिया की त्रेतायुग में राम भगवान तुम्हारे घर आएंगे और साथ मित्रता करेंगे। तुम्हे मोक्ष की प्राप्ति होगी। इस प्रकार अनजाने में किये गए शिवरात्रि व्रत से भगवान शंकर ने शिकारी को मोक्ष प्रदान किया।