अगर चाहते है हमेशा बनी रहती है ग्रहों एवं देवताओं की कृपा तो खुश रखें अपने पितरों को..!!!

हमारे हिन्दू धर्म में अनेक की मान्यताएँ है जो किसी न किसी बात से जुडी हुई है ऐसी ही एक मान्यता के अनुसार, हमारे हिन्दू धर्म में कोई भी व्यक्ति पूरी तरह नहीं मरता है और वह किसी न किसी रूप में बार-बार जन्म लेता है, यानी जीवन मृत्यु का ये चक्र चलता ही रहता है यह भी कहा गया है मरने के बाद व्यक्ति पितृ बन जाते है इसलिए पितृ पक्ष में पिंडदान और तर्पण कर पुरखों को खुश करने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। वेदों में कहा

श्राद्ध में पिंड दान
श्राद्ध में पिंड दान

 

गया है भाद्रपद पूर्णिमा से ही पितर मृत्यु लोक में आ जाते हैं और कुशा की नोक पर विराजमान हो जाते हैं।

नारद एवं पद्मपराण के अनुसार, पितरों के खुश होने पर समस्त देवगण प्रसन्न होते हैं। शास्त्रों में लिखा है कि जिन पर पितर प्रसन्न होते हैं, उन पर ही ग्रहों एवं देवताओं की कृपा होती है, अतः यत्नपूर्वक पूजा-अनुष्ठान द्वारा पितरों की शांति और प्रसन्नता के उपाय किए जाने चाहिए। पितर के प्रसन्न होने से जीवन की समस्याओं का समाधान स्वतः हो जाता है। श्राद्ध के दौरान हम पितृ गण के निमित्त जो भी निकालते हैं, उसे वह सूक्ष्म रूप से आकर

ग्रहण करते हैं। मनुष्य के पास यह एक मौका होता है कि यदि उनसे अपने पूर्वजों के प्रति कोई गलती हो गई हो उसके लिए क्षमा मांग लें। पितृपक्ष में पितरों के निमित्त जो श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध करता है, उसके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं।

पितृपक्ष में पितरों का श्रद्धा
पितृपक्ष में पितरों का श्रद्धा

इस अवधि को काल नवरात्रि से अधिक कल्याणकारी माना गया है क्योंकि इस बीच श्रद्धा और सात्विक ढंग से पितरों को खुश करने पर देवगण प्रसन्न होते हैं और जीवन की तमाम परेशानियां अपने आप ही समाप्त हो जाती हैं।

 

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