इस शिवलिंग से होकर जाता है पाताल का रास्ता!!!

इस शिवलिंग से होकर जाता है पाताल का रास्ता!!!

छत्‍तीसगढ़ राज्‍य अपनी अनूठी और प्राचीन सांस्‍कृतिक विरासत के लिए पूरी दुनिया में विख्‍यात है. राज्‍य के विभिन्‍न इलाकों में मौजूद प्राचीन मंदिर अपने आप में अनूठी विविधता और सनातन धार्मिक महत्‍व को समेटे हुए हैं. आइए, आपको प्रदेश में मौजूद एक ऐसे ही मंदिर के दर्शन कराते हैं जहां दुर्लभ शिवलिंग रूप में विराजमान हैं भोले भंडारी। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 120 किलोमीटर दूर काशी के नाम से प्रसिद्ध खरौद नगर में स्थित लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर अपने आप में अनूठा है।

लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर
लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर

पहले तो यह जान लीजिए कि यह शिवलिंग अन्य शिवलिंगों की तरह नहीं है।रामायणकालीन लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर के गर्भगृह में विराजमान इस शिवलिंग में एक लाख छिद्र हैं. कहते हैं कि इनमें से एक छिद्र में ही छिपा है पाताल जाने का रास्‍ता। शिवलिंग में एक लाख छिद्र होने के कारण ही इसे लक्षलिंग भी कहा जाता है. इसमें से एक छिद्र पातालगामी हैं, जिसमें कितना भी पानी डालिए वो सब इसमें समाहित हो जाता है।

पौराणिक कथा-

इस मंदिर के निर्माण के पीछे की कथा बड़ी ही रोचक है। साथ ही इस मंदिर का निर्माण कुछ इस तरह किया गया है कि सुनने वाले और सुनाने वाले को इस पर यकीन करना मुश्किल होगा।इसके निर्माण की कथा यह है कि रावण का वध करने के बाद श्रीराम को ब्रह्म हत्या का पाप लगा, क्योंकि रावण एक ब्राह्मण था। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए श्रीराम और लक्ष्मण रामेश्वर लिंग की स्थापना करते हैं। शिव के अभिषेक के लिए लक्ष्मण सभी प्रमुख तीर्थ स्थलों से जल एकत्रित करते हैं।

लक्ष्मणेश्वर महादेव शिवलिंग
लक्ष्मणेश्वर महादेव शिवलिंग

इस दौरान वे गुप्त तीर्थ शिवरीनारायण से जल लेकर अयोध्या के लिए निकलते समय रोगग्रस्त हो गए। रोग से छुटकारा पाने के लिए लक्ष्मण शिव की आराधना की, इससे प्रसन्न होकर शिव दर्शन देते हैं और लक्षलिंग रूप में विराजमान होकर लक्ष्मण को पूजा करने के लिए कहते हैं। लक्ष्मण शिवलिंग की पूजा करने के बाद रोग मुक्त हो जाते हैं और ब्रह्म हत्या के पाप से भी मुक्ति पाते हैं, इस कारण यह शिवलिंग लक्ष्मणेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

मंदिर के मुख्य द्वार में प्रवेश करते ही सभा मंडप मिलता है। इसके दक्षिण तथा वाम भाग में एक-एक शिलालेख दीवार में लगा है।दक्षिण भाग के शिलालेख की भाषा अस्पष्ट है अत: इसे पढ़ा नहीं जा सकत। उसके अनुसार इस लेख में आठवी शताब्दी के इन्द्रबल तथा ईशानदेव नामक शासकों का उल्लेख हुआ है। मंदिर के वाम भाग का शिलालेख संस्कृत भाषा में है।इसमें 44 श्लोक हैं। कुछ विद्वान इसको छठी शताब्दी का मानते हैं।मंदिर के बाहर परिक्रमा में राजा खड्गदेव और उनकी रानी हाथ जोड़े स्थित हैं।

प्रति वर्ष यहां महाशिवरात्रि के मेले में शिव की बारात निकाली जाती है।छत्तीसगढ़ में इस नगर की काशी के समान मान्यता है।कहते हैं, भगवान राम ने इस स्थान पर खर और दूषण नाम के असुरों का वध किया था, इसी कारण इस नगर का नाम खरौद पड़ा।

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