नारी तेरा नारीत्व नहीं किसी का मोहताज; नारी का स्थान सर्वोपरी…!!!

नारी;धार्मिक कहानी (Hindi Dharmik Kahani)

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवतामहाभारत(mahabharat) की यह उक्ति हमें सदैव यह याद दिलाती रहती है कि नारी(Nari) का स्थान सर्वोपरी है। वैदिक(Vedic) युग से लेकर आज तक नारी के महत्त्व को स्वीकार किया गया है।

त्रिदेवियाँ
त्रिदेवियाँ

जीवन के सभी क्षेत्रों में नारी की प्रमुखता रही है। “नारी तू नारायणी”कहकर इसको सम्मान दिया गया हैं। हमारे भारतवर्ष में सदा से नारियों का समुचित सम्मान रहा है। उन्हें पुरुषों की अपेक्षा अधिक पवित्र माना जाता रहा है। नारियों को बहुधा ‘देवी‘(Devi)सम्बोधन से सम्बोधित किया जाता रहा है। नाम के पीछे उनकी जन्मजात उपाधि ‘देवी’ प्राय: जुड़ी रहती है।

शान्ति देवी, गंगा देवी, दया देवी आदि ‘देवी’शब्द पर कन्याओं के नाम रखे जाते हैं। कन्याएँ अपने जन्म- जात ईश्वर प्रदत्त दैवी गुणों, दैवी विचारों और दिव्य विशेषताओं के कारण अलंकृत होती हैं।

इतना ही नहीं बल्कि देवताओं और महापुरुषों के साथ भी उनकी अर्धांगिनियों के नाम भी जुड़े हुए हैं। सीताराम(Seetaram), राधेश्याम(Radheshyam), गौरीशंकर(Gaurishankar), लक्ष्मीनारायण(Laxminarayan), उमामहेश(Umamahesh), माया- ब्रह्म, सावित्री- सत्यवान्(Savitri Satyavan) आदि नामों से नारी को पहला और नर को दूसरा स्थान प्राप्त है।

माँ दुर्गा
माँ दुर्गा

और ऐसा कहा जाता है इन नामों को लेने से ज्यादा फल प्राप्त होते है वरन भगवान के अकेले नाम लेने से। इन नामों में दोनों नामों की शक्ति प्राप्त होती है। पतिव्रत, दया, करुणा, सेवा- सहानुभूति, स्नेह, वात्सल्य, उदारता, भक्ति- भावना आदि गुणों में नर की अपेक्षा नारी को सभी विचारवानों ने बढ़ा- चढ़ा माना है।

इसलिये धार्मिक(Dharmik), आध्यात्मिक और ईश्वर(Ishwar) प्राप्ति सम्बन्धी कार्यों में नारी का सर्वत्र स्वागत किया गया है और उसे उसकी महत्ता के अनुकूल प्रतिष्ठा दी गयी है। वेदों पर दृष्टिपात करने से स्पष्ट हो जाता है कि वेदों के मन्त्रदृष्टा जिस प्रकार अनेक ऋषि हैं, वैसे ही अनेक ऋषिकाएँ भी हैं।

 माँ लक्ष्मी
माँ लक्ष्मी

ईश्वरीय ज्ञान वेद महान् आत्मा वाले व्यक्तियों पर प्रकट हुआ है और उनने उन मन्त्रों(mantra) को प्रकट किया। इस प्रकार जिन पर वेद प्रकट हुए, उन मन्त्रद्रष्टओं को ऋषि कहते हैं। ऋषि(Rishi) केवल पुरुष ही नहीं हुए हैं, वरन् अनेक नारियाँ भी हुई हैं। ईश्वर(Ishwar) ने नारियों के अन्त:करण में भी उसी प्रकार वेद(Ved) ज्ञान प्रकाशित किया हैं। ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह यज्ञ करती और कराती थीं। वे यज्ञ- विद्या और ब्रह्म- विद्या में पारंगत थीं। कई नारियाँ तो इस सम्बध में अपने पिता तथा पति का मार्ग दर्शन करती थीं।

कुछ पंकितयां नारी को समर्पित:

तु ही दुर्गा तू ही काली,

तु ही लक्ष्मी तू ही सरस्वती ।

तु है माया तू महामाया,

तुझ में यह सृष्टी समाया ।

तुझे कोई समझ न पाया,

नर देव दानव और गन्धर्व ।

॥ नारी तेरा नारीत्व नहीं किसी का मोहताज ॥

 

॥ हर एक नारी को प्रणाम ॥