इस अध्बुध मंदिर मे देवी ने असुर मुंड का किया था वध..!!!

आज हम आपको बिहार के एक ऐसे मंदिर के बारे में बता रहे हैं, जो दुनिया का सबसे पुराना मंदिर है जहां आज भी पूजा होती है।ये कैमूर की पहाड़ी (कैमूर जिला)पर 650 फीट ऊंचाई पर है।  इसे 635-636 ईस्वी में बनाया गया था। बताया जाता है माँ मुण्डेश्वरी का मंदिर पूर्णतः श्री यन्त्र पर निर्मित है। इसके अष्टकोणीय आधार एवं चतुर्दिक अवस्थित भग्नावशेषों के पुरातात्विक अध्ययन के पश्चात् यह तथ्य प्रमाणित हो चुका है।

मुंडेश्वरी माता मंदिर
मुंडेश्वरी माता मंदिर

पुराणों के अनुसार इस मंदिर को लेकर ऐसी मान्यता है कि चंड-मुंड नाम के असुरों का नाश करने के लिए, जब देवी प्रकट हुई तो चंड के मारे जाने के बाद युद्ध करते-करते मुंड इसी पहाड़ी में आकर छिप गया था। यहीं पर देवी ने उसका वध किया था। इसी वजह से इसे मुंडेश्वरी माता का मंदिर कहा जाता है। पहाड़ी पर जगह-जगह बिखरे पत्थरों में सिद्धयंत्र और श्लोक खुदे हुए हैं। गर्भगृह का ढांचा अष्टाकार है। एक कोने में देवी मुंडेश्वरी जबकि बीच में

चतुर्मुखी शिवलिंग है। अनुमान लगाया जाता है कि जब ये अपनी पूर्वअवस्था में रहा होगा, तब देवी के चारों ओर अलग-अलग देवताओं की मूर्तियां स्थापित रही होंगी। यहां की कई खंडित मूर्तियां पटना के संग्रहालय में भी रखी गई हैं।

नवरात्र के दौरान मुंडेश्वरी मंदिर में बलि चढ़ाने की परंपरा है। देवी मां से मांगी गई मन्नत जब पूरी हो जाती है तो भक्त यहां बकरे की बलि देते हैं, लेकिन खास बात यह है कि बिना बकरे की जान लिए और बिना खून बहाए ही यहां बलि दी जाती है।

परंपरा के अनुसार मंदिर के पुजारी बलि के बकरे को देवी मां की प्रतिमा के सामने खड़ा कर देते हैं और देवी मां के चरणों में अक्षत अर्पण कर उसी अक्षत

मुंडेश्वरी माता मंदिर में माँ की मूर्ति
मुंडेश्वरी माता मंदिर में माँ की मूर्ति

को बलि के उस बकरे पर फेंकते हैं। अक्षत फेंकने के बाद बकरा बेहोश हो जाता है और जब बकरा होश में आता है तो उसे लोग अपने घर ले जाते हैं। यहां बलि देने की यह परंपरा सालों से चली आ रही है।

मंदिर के कुछ अन्य रोचक तथ्य

1.यहाँ भगवान शिव का एक पंचमुखी शिवलिंग है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका रंग सुबह, दोपहर और शाम को अलग-अलग दिखाई देता है।

2.मंदिर का अष्टाकार गर्भगृह इसके निर्माण से अब तक कायम है।

3.जानकार यह मानते हैं कि उत्तर प्रदेश के कुशीनगर और नेपाल के कपिलवस्तु का मार्ग मुंडेश्वरी मंदिर से जुड़ा हुआ था।

4.यहां दर्शन के लिए श्रीलंका से भी श्रद्धालु आते थे। इस बात का प्रमाण मंदिर के रास्तों में पाए गए सिक्के हैं। सिक्कों और यहां पहाड़ी के पत्थरों पर तमिल और सिंहली भाषा में अक्षर लिखे हुए हैं। पहाड़ी पर एक गुफा भी है। हालांकि, इसे सुरक्षा की वजह से बंद कर दिया गया है।

॥ जय माँ मुंडेश्वरी ॥

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