जानिए कैसे हुई मृत संजीवनी मंत्र; महामृत्युंजय मंत्र की संरचना..!!!

भगवान शिव से जुड़ी कथा (Stories of Lord Shiv)

महामृत्युंजय मंत्र हमारे सनातन धर्म के प्रमुख मन्त्रों में से एक है

जिसका संबंध भगवान शिव से है और जो उनको अत्यंत प्रिय माना गया है।

माना जाता है यह मंत्र मृत्यु को जीतने वाला मंत्र है।

कहा गया है जिस तरह देवताओं के पास अमृत है तो दानवों के पास इस मंत्र की शक्ति है।

आइये जानते है कि इस दिव्य मंत्र की रचना कैसे हुई थी और इस मंत्र का रहस्य क्या है।

शिवजी के अनन्य भक्त मृकण्ड ऋषि संतानहीन होने के कारण दुखी थे. मृकण्ड ने सोचा कि महादेव संसार के सारे विधान बदल सकते हैं.

इसलिए क्यों न भोलेनाथ को प्रसन्नकर यह विधान बदलवाया जाए।

मृकण्ड ने घोर तप किया. भक्त की भक्ति के आगे भोले झुक ही जाते हैं।

भगवान महादेव प्रसन्न हुए।

उन्होंने ऋषि को कहा कि मैं विधान को बदलकर तुम्हें पुत्र का वरदान दे रहा हूं लेकिन इस वरदान के साथ हर्ष के साथ विषाद भी होगा।

भोलेनाथ के वरदान से मृकण्ड को पुत्र हुआ जिसका नाम मार्कण्डेय पड़ा.

ज्योतिषियों ने मृकण्ड को बताया कि यह विलक्ष्ण बालक अल्पायु है.

इसकी उम्र केवल 12 वर्ष है।

ऋषि का हर्ष विषाद में बदल गया.

मृकण्ड ने अपनी पत्नी को आश्वत किया- जिस ईश्वर की कृपा से संतान हुई है वही भोले इसकी रक्षा करेंगे.

भाग्य को बदल देना उनके लिए सरल कार्य है।

मार्कण्डेय बड़े होने लगे तो पिता ने उन्हें शिवमंत्र की दीक्षा दी.

मार्कण्डेय की माता बालक के उम्र बढ़ने से चिंतित रहती थी.

उन्होंने मार्कण्डेय को अल्पायु होने की बात बता दी।

महामृत्युंजय मंत्र की संरचना

मार्कण्डेय ने निश्चय किया कि माता-पिता के सुख के लिए उसी सदाशिव भगवान से दीर्घायु होने का वरदान लेंगे जिन्होंने जीवन दिया है.

बारह वर्ष पूरे होने को आए थे।

मार्कण्डेय ने शिवजी की आराधना के लिए महामृत्युंजय मंत्र की रचना की और शिव मंदिर में बैठकर इसका अखंड जाप करने लगे।
समय पूरा होने पर यमदूत उन्हें लेने आए. यमदूतों ने देखा कि बालक महाकाल की आराधना कर रहा है तो उन्होंने थोड़ी देर प्रतीक्षा की.

मार्केण्डेय ने अखंड जप का संकल्प लिया था.

यमदूतों का मार्केण्डेय को छूने का साहस न हुआ और लौट गए.

उन्होंने यमराज को बताया कि वे बालक तक पहुंचने का साहस नहीं कर पाए।

इस पर यमराज ने कहा कि मृकण्ड के पुत्र को मैं स्वयं लेकर आऊंगा.

यमराज मार्कण्डेय के पास पहुंच गए।

बालक मार्कण्डेय ने यमराज को देखा तो जोर-जोर से महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए शिवलिंग से लिपट गया.

यमराज ने बालक को शिवलिंग से खींचकर ले जाने की चेष्टा की तभी शिवलिंग से स्वयं महाकाल प्रकट हो गए.

यमराज महाकाल के प्रचंड रूप से कांपने लगे.

महाकाल ने कहा मैं अपने भक्त की स्तुति से प्रसन्न हूं और मैंने इसे दीर्घायु होने का वरदान दिया है.

तुम इसे नहीं ले जा सकते।

यम ने कहा- प्रभु आपकी आज्ञा सर्वोपरि है.

मैं आपके भक्त मार्कण्डेय द्वारा रचित महामृत्युंजय का पाठ करने वाले को त्रास नहीं दूंगा।

और इसलिए सोमवार को महामृत्युंजय का पाठ करने से शिवजी की कृपा होती है और कई असाध्य रोगों, मानसिक वेदना से राहत मिलती है.:!

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