प्रसंग जो तुलसी का भगवान कृष्ण को अति प्रिय होने की ओर करती हैं इशारा; जरूर पढ़ें..!!!

भगवान श्रीकृष्ण लीलाधर हैं जिन्होंने अपनी लीलाओं से सबका मन मोह रखा हैं। ऐसे में आज हम आपको उनकी ही एक ऐसी लीला के बारे में बता रहें हैं जो बताएगी की उनको तुलसी कितनी पसंद हैं इसके पीछे एक पौराणिक कहानी है, बता दें कृष्ण विष्णु का अवतार हैं और भगवान विष्

तुलसी का विवाह
तुलसी का विवाह

णु को तुलसी बहुत प्रिय हैं इसलिए कृष्ण को भी प्रिय हैं ।पौराणिक कथा के अनुसार एक बार सत्यभामा को घमंड हो गया था कि कृष्ण को वे ही सबसे प्रिय हैं । जब यह बात नारद मुनि को पता चली तो उन्होंने इस घमंड को खत्म करने का निश्चय किया क्योंकि वे जानते थे कि कृष्ण से सबसे अधिक तुलसी प्रिय हैं।

 

नारद मुनि द्वारका पहुंचे और अपनी लीला शुरू की। उन्होंने सत्यभामा को अपनी बातों के जाल में फंसाया और कहा कि तुलाभ्राम व्रत करने से कृष्ण और आपके बिच का प्रेम कई गुणा बढ़ जाएगा। इस व्रत में उन्हें नारद जी को कृष्ण का दान करना होगा और फिर से वापस पाने के लिए उन्हें कृष्ण के

वज़न के बराबर के स्वर्ण नारद जी को दान में देने होंगे। अन्यथा कृष्ण हमेशा के लिए उनके गुलाम बन जाएंगे।

सत्यभामा को उसके पिता के पास रखी हुई स्यमन्तक मणी का ध्यान आया जो सूर्य देव से प्राप्त हुई थी। यह मणी रोज़ एक किलो सोना देती थी। सत्यभामा को नारद मुनि ने संकेत भी दिया कि वह इतना धन नहीं दे पाएंगी पर सत्यभामा ने व्रत के लिए हामी भर दी।

तुलसी के पत्ते
तुलसी के पत्ते

सभी रानियों के निवेदन करने के बावजूद सत्यभामा ने यह व्रत किया और नारद जी को कृष्ण का दान कर दिया। सत्यभामा ने स्वर्णों को एकत्रित करना शुरू किया। फिर एक तुला मंगवाई गयी जिसके एक पलड़े पर कृष्ण बैठे और दूसरे पलड़े पर सत्यभामा की सम्पत्ति रखी गयी। लेकिन वह स्वर्ण थोड़े रह गए, तभी सत्यभामा ने अन्य रानियों से मदद मांगी। सभी ने अपने आभूषण और सम्पत्ति दे दी लेकिन फिर भी सारे स्वर्ण मिलकर श्री कृष्ण

के भार से कम निकले। कृष्ण वहां मौन बैठे रहे क्योंकि उन्हें तो सबकुछ पहले से पता था।अब तक सत्यभामा का सारा घमंड चूर हो चूका था ।

तभी नारद जी ने सत्यभामा को सुझाव दिया कि रुक्मिणी शायद कुछ कर सकतीं हैं।  सत्यभामा ने तब अपने घमंड को हटा कर रुक्मिणी से मदद मांगी।

रुक्मणि ने आकर श्रीकृष्ण का ध्यान लगाया और पूजनीय तुलसी का एक पत्ता उन स्वर्णों को हटा कर तुला पर रखा। उस तुलसी के पत्ते से कृष्ण का पलड़ा हल्का हो गया और अंत में सत्यभामा ने कृष्ण, रुक्मणि और नारद जी से माफी मांगी अब तक वे समझ गई थी की कृष्ण को सबसे प्रिय तुलसी  हैं ।

॥जय श्री कृष्ण ॥

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